हाई कोर्ट ने 1997 डिक्री रद्द की, श्रीराम मंदिर भूमि अतिक्रमण पर रात में चली बड़ी कार्रवाई
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हाई कोर्ट ने 1997 की संदिग्ध डिक्री को अवैध घोषित कर श्रीराम मंदिर भूमि पर सरकार और धार्मिक प्राधिकरणों के अधिकार को स्पष्ट किया।
फैसले के बाद प्रशासन ने देर रात भारी सुरक्षा के बीच बुलडोजर चलाकर विवादित भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया और गैर-कानूनी निर्माण हटाए।
अदालत ने कहा कि फर्जी वसीयत या गलत दस्तावेजों से धार्मिक संपत्ति का दावा स्वीकार नहीं होगा, प्रशासन ने आगे भी सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी।
आगर मालवा (मध्यप्रदेश) — मां बगलामुखी मंदिर परिसर स्थित श्रीराम मंदिर की जमीन पर दो दशकों से अधिक समय से चल रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है। हाई कोर्ट ने शुक्रवार को 1997 में कुछ लोगों द्वारा फर्जी दस्तावेजों, छुपाए गए तथ्यों और संदिग्ध वसीयत के आधार पर प्राप्त की गई डिक्री को पूरी तरह अवैध और अमान्य घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि झूठे दस्तावेजों और धोखाधड़ी के आधार पर मंदिर की भूमि पर अधिकार सिद्ध नहीं किया जा सकता। फैसले के बाद लंबे समय से चला आ रहा विवाद न्यायिक रूप से सुलझ गया और प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई शुरू की।
हाई कोर्ट का आदेश आते ही जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और पुलिस हरकत में आ गए। देर रात भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मंदिर परिसर में विवादित भूमि से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई। स्थानीय प्रशासन ने दुकानों और स्थायी निर्माणों पर JCB चलवाकर क्षेत्र को कब्जे से मुक्त कराया। अतिक्रमण हटाने के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या विरोध को रोका जा सके।
प्रशासन ने स्पष्ट किया कि भूमि राजस्व अभिलेखों में मंदिर/धर्मशाला की संपत्ति के रूप में दर्ज है और धार्मिक संस्थान के पारंपरिक गुरु-शिष्य उत्तराधिकार प्रणाली की पुष्टि भी रिकॉर्ड में मिलती है। इसलिए किसी भी फर्जी वसीयत या हेरफेर किए गए दस्तावेजों के आधार पर भूमि पर स्वामित्व का दावा मान्य नहीं हो सकता। प्रशासन ने कहा कि कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर परिसर की भूमि पर कोई भी अवैध निर्माण या कब्जा अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विवाद की जड़ 1997 की उस डिक्री से जुड़ी थी, जिसे कुछ लोगों ने आवश्यक तथ्यों को छिपाकर और नकली दस्तावेज प्रस्तुत कर प्राप्त कर लिया था। इसके बाद विरोध, जांच और कानूनी प्रक्रिया के चलते मामला जिला न्यायालय के पास पहुंचा। 14 मार्च 2007 को अपर जिला न्यायाधीश ने विस्तृत सुनवाई के बाद इस डिक्री को अवैध घोषित कर दिया। हालांकि, इसके खिलाफ पहली अपील दायर की गई, जो 18 वर्षों से अधिक समय तक लंबित रही — और शुक्रवार को हाई कोर्ट ने इस अपील को खारिज करते हुए जिला न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर क्षेत्र की जमीन को लेकर कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है। प्रशासन का कहना है कि आने वाले दिनों में भी मंदिर भूमि को सुरक्षित रखने और भविष्य के किसी भी अतिक्रमण या अवैध स्वामित्व दावे को रोकने के लिए सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। इस निर्णय को धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा और अवैध कब्जों पर कड़ा संदेश माना जा रहा है।