Ashtavinayak forms of Ganesha | आततायी शक्तियों के विनाश के लिए वीर गणपति बने अष्टविनायक

Fri 29-Aug-2025,10:07 PM IST +05:30

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Ashtavinayak forms of Ganesha | आततायी शक्तियों के विनाश के लिए वीर गणपति बने अष्टविनायक Ashtavinayak forms of Ganesha
  • वीर गणपति का योद्धा स्वरुप और उसका महत्व.

  • अष्टविनायक अवतारों की कथाएँ और शिक्षा.

  • साहस, शक्ति और शत्रुनाश का दिव्य संदेश.

Madhya Pradesh / Jabalpur :

Jabalpur / अनादि काल से भगवान श्रीगणेश की पूजा बुद्धि,ज्ञान और सौभाग्य के देवता के रुप में विभिन्न स्वरुपों में सनातन में होती आ रही है, परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हिंदुओं को,देश काल परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान और भावी पीढ़ी का परिचय केवल मोदक वाले, सूंड वाले, बड़े उदर वाले,नटखट बाल गणेश से ही नहीं कराना चाहिए,अपितु वीर गणपति से भी कराना चाहिए, ताकि वे भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें।साथ ही मिशनरियों,वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलरों द्वारा श्रीगणेश के स्वरुप और लीलाओं को लेकर बनाई गई नौटंकियों का पटाक्षेप हो सके। इसलिए मोदक वाले सौम्य गणपति जी के साथ रौद्र वीर गणपति से भी परिचय कराना होगा,ताकि आने वाले समय के संकटों का सामना कर अपने हिन्दुत्व की रक्षा कर सकें।

 भगवान गणेश एक महा योद्धा हैं। गणेश जी के योद्धा रूप को वीर गणपति कहा जाता है। वस्तुतः यह स्वरुप सोलह भुजाओं वाला होता है। ये अपने हाथों में क्रमशः बैताल, भाला, धनुष, चक्रायुध, खड़ग, ढाल, हथौड़ा, गदा, पाश, अंकुश, नाग, शूल, कुन्द, कुल्हाड़ी, बाण और ध्वजा धारण करते हैं। इनकी छवि क्रोधमय तथा विकराल है। शत्रुनाश एवं आत्म संरक्षण के उद्देश्य से की गई आराधना अविलम्ब लाभ पहुंचाती है। वीर गणपति की पूजा करने से अदम्य साहस का संचार और शक्ति प्राप्त होती है, साथ ही हार न मानने की प्रेरणा मिलती है।
भगवान श्रीगणेश ने भी समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए 8 अवतार लिए थे। ये आठ अवतार ही अष्टविनायक कहलाते हैं।

एकदंत अवतार-एक बार महर्षि च्यवन अपने तपोबल के माध्यम से मद की रचना की थी, और वह महर्षि का पुत्र भी कहलाया। मद ने दैत्य गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा लेकर देवताओं पर अत्याचार करने लगा तब सभी देवताओं ने भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र का आह्वान किया, फिर भगवान ने एकदंत के स्वरुप में अवतार लिया। एकदंत भगवान ने मदासुर को युद्ध में पराजित कर दिया और देवताओं को अभय का वरदान दिया।

वक्रतुंड अवतार-भगवान गणेश ने वक्रतुंड अवतार मत्सरासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए लिया था।मत्सरासुर भगवान शिव का भक्त और उसने भगवान शिव से वरदान पा लिया था कि वह किसी भी योनि के प्राणी से नहीं हारेगा।मत्सरासुर के दो पुत्र क्रमशः सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय भी थे और दोनों ही अत्याचारी थे. वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।तब भगवान गणेश ने वक्रतुंड अवतार लेकर मत्सरासुर को पराजित किया और उसके दोनों पुत्रों का संहार किया।

महोदर अवतार-दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नामक एक राक्षस को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा-दीक्षा देकर देवताओं के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया । मोहासुर के अत्याचारों से परेशान देवी-देवताओं ने मिलकर भगवान गणेश का आह्वान किया।तब गणेशजी ने महोदर अवतार लिया, महोदर अर्थात बड़े पेट वाला। महोदर अपने मूषक पर सवार होकर मोहासुर से युद्ध करने पहुंचे  तभी मोहासुर ने भयाक्रांत होकर बिना युद्ध किए महोदर अवतार को अपना इष्ट बना लिया।

गजानन अवतार-भगवान कुबेर के लोभ से लोभासुर का जन्म हुआ था।लोभासुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य की शरण में गया और वहां से शिक्षा ली। शुक्राचार्य के कहने पर लोभासुर ने भगवान शिव से वरदान पाने के लिए कठोर साधना की।साधना से प्रसन्न होकर लोभासुर को निर्भय होने का वरदान दे दिया।वरदान पाकर लोभासुर ने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया,तब सभी ने गणेशजी की प्रार्थना की और भगवान गणेश ने गजानन के रुप में अवतार लिया इसके बाद शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्द किए पराजय स्वीकार कर ली।

विकट अवतार-जलंधर का एक पुत्र हुआ कामासुर।कामासुर ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया था। वरदान पाकर कामासुर ने देवताओं पर अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया।असुर से परेशान होकर सभी देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया और असुर से मुक्ति की प्रार्थना की।तब भगवान गणेश ने विकट अवतार लिया इस अवतार में भगवान गणेश मोर पर विराजित होकर आए और कामासुर को पराजित कर दिया।

लंबोदर अवतार-एक बार क्रोधासुर नामक राक्षस ने सूर्यदेव की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने क्रोधासुर को ब्रह्मांड पर विजय पाने का आशीर्वाद दे दिया। इसके बाद सभी देवी-देवता क्रोधासुर से भयभीत हो गए और भगवान गणेश का आह्वान किया।देवताओं की प्रार्थना को सुनकर भगवान गणेश ने लंबोदर का अवतार लिया। भगवान लंबोदर ने क्रोधासुर को रोक लिया और समझाया कि ब्रह्मांड पर कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर सकते और ना ही अजेय योद्धा हो सकते।क्रोधासुर ने फिर अपना अभियान रोक दिया और हमेशा के लिए पाताल लोक में चला गया।

धूम्रवर्ण अवतार-एक बार ब्रह्माजी ने सूर्य भगवान को कर्म राज्य का स्वामी बना दिया, इससे उनके अंदर घमंड आ गया।राज्य करते हुए सूर्य भगवान को छींक आ गई, जिससे एक दैत्य की उत्पत्ति हुई, छींक से उत्पन्न हुए दैत्य का नाम अहंता पड़ा। अहंता दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास चला गया और वह अहंतासुर बन गया।इसके बाद उसने स्वयं का राज्य भी बना लिया और भगवान गणेश की पूजा करके वरदान भी प्राप्त कर लिया।

वरदान पाकर अहंतासुर देवताओं पर अत्याचार करने लगा, तब सभी ने भगवान गणेश को आह्वान किया. देवताओं के आह्वान पर भगवान गणेश ने धूर्मवर्ण का अवतार लिया. धूर्मवर्ण का रंग धुएं जैसा था और वे बहुत विकराल थे, उनके एक हाथ में भीषण पाश थे, जिसमें से भयंकर ज्वालाएं निकल रही थीं,धूर्मवर्ण ने अहंतासुर का अंत किया और देवताओं को राहत दी।

विघ्नराज अवतार-एक बार माता पार्वती अपनी सखियों के साथ कैलाश पर्वत पर विचरण रहीं थी, तभी बातचीत में हंसी आ गई,उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई और उन्होंने उसका नाम ‘मम’ रख दिया। मम वन में तप करने चला गया, जहां उसकी मुलाकात शंबासुर से हुई, शंबासुर ने मम को कई आसुरी शक्तियां दीं।इसके बाद मम ने गणेशजी को प्रसन्न करके ब्रह्मांड का राज मांग लिया।जब इसके बारे में शुक्राचार्य को जानकारी मिली तब उन्होंने मम को दैत्यराज का पद दे दिया।

पद मिलने के बाद मम ने देवताओं को पकड़कर कारागार में डाल दिया।तब देवताओं ने भगवान गणेश का आह्वान किया और उनको अपनी समस्याओं के बारे में अवगत कराया। भगवान गणेश ने विघ्नराज अवतार का अवतार लिया और फिर ममासुर का मान मर्दन करते हुए देवताओं को बंदी गृह से छुड़वाया।

भगवान वीर गणपति के अष्टविनायक स्वरुप अद्भुत एवं अद्वितीय हैं और उनकी इन स्वरूपों में विलक्षण रणनीति हिन्दुओं के लिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शत्रुओं के शमन के लिए अत्यंत मार्गदर्शी है।वीर गणपति के अष्टविनायक स्वरूपों से यही ब्रम्ह ज्ञान मिलता है कि आसुरी प्रवृतियों के विनाश के लिए यथायोग्य युक्ति का प्रयोग कर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

डॉ.आनंद सिंह राणा,

श्रीजानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत।