Paryushan festival Special | आत्मा के विशुद्ध गुणों की आराधना का महापर्व है, पर्युषण

Fri 29-Aug-2025,10:26 PM IST +05:30

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Paryushan festival Special | आत्मा के विशुद्ध गुणों की आराधना का महापर्व है, पर्युषण Paryushan festival 2025
  • पर्युषण पर्व: आत्मशुद्धि और तप का महापर्व।

  • दशलक्षण धर्मों से जीवन में सत्य और अहिंसा की प्रेरणा।

  • क्षमावाणी दिवस से मैत्रीभाव और क्षमा का संदेश।

Madhya Pradesh / Jabalpur :

Jabalpur / सनातन में भाद्र पद माह अत्यंत वन्दनीय है, इस माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश का प्रकटोत्सव प्रारम्भ होता है,तो वहीं दिगम्बर जैन धर्मावलंबियों के पर्युषण पर्व पंचमी से आरम्भ हो जाते हैं। इस तरह दोनों महापर्वो का एक साथ सौम्य समाहर देखने को मिलता है, और इन दस दिवसीय अनुष्ठानों का समापन अनंत चतुर्दशी को एक साथ होता है, यही एकत्व भारतीय परंपरा में मणि -कांचन योग का पर्याय है।

पर्युषण का अर्थ है परि यानी चारों ओर से, उषण यानी धर्म की आराधना। पर्युषण को महावर्प कहा जाता है। यह पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जीने दो की राह पर चलना सिखाता है तथा मोक्ष प्राप्ति के द्वार खोलता है। इस पर्वानुसार- 'संपिक्खए अप्पगमप्पएणं' अर्थात आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो।

दिगम्बर जैनों की मान्यतानुसार पर्यूषण चातुर्मासीय साधना का पर्व है। जैनों के कल्पसूत्र आगम में लिखा है, आषाढ़ चातुर्मास के आरंभ से एक मास और 20 रात्रि व्यतीत होने और 70 दिन शेष रहने पर भगवान महावीर ने पर्व पर्यूषण की आराधना की।

पर्यूषण शब्द का अर्थ है-आत्म के समीप निवास करना। इसका अभिप्राय है आध्यात्मिक जगत से स्वयं को जोड़ना। पर्व स्वयं को निखरने की ओर प्रेरित करता है। खुद का चितन और निखार आने, सुनने और लिखने में जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही यह कठिन है। आधुनिक युग की प्रतिस्पर्धा में जीवन वैमनस्यों से भरा है, इसलिए शारीरिक और मानसिक अवसाद भी चरम पर है जिसके निराकरण के लिए पर्युषण पर्व वरदान है।

पर्युषण पर्व प्रारंभ हो गए हैं,इसे जैन परंपरा में दशलक्षण पर्व भी कहते हैं। इन दिनों में आत्मा के विशुद्ध गुणों की आराधना की जाती है। अनादि काल से संसारी प्राणीयों में विभाव कर्मों का प्रभाव है जो आत्मा के स्वाभाविक गुणों को ढके हुए है। इन्हीं विभावभावों को दूर कर स्वाभाविक गुणों की आराधना,भक्तिपूजा, स्वाध्याय और संयम आदि रूप दिनचर्या बनाकर इन दिनों में की जाती है। जहां हिंदू धर्म में श्री गणेश जी की स्थापना होती है वहीं जैन धर्म में दिगंबर आमना में पर्युषण पर्व का शुभारंभ हो जाता है।

दशलक्षण धर्मो में पहला धर्म उत्तम क्षमा का है। क्षमा आत्मा का स्वाभाविक धर्म है। दूसरा मार्दव धर्म है। मृदुता का भाव मार्दव है। मनुष्य के विचार और व्यवहार में जो सहज नम्रता कोमलता रहती है उसे ही संतों ने मार्दव धर्म कहा है। 

पयुर्षण का तीसरा दिन को आर्जव धर्म कहा गया है। हम सभी देखें कि सर्प बाहर कितना ही लहराकर क्यों ना चलता रहे किन्तु जब भी वह बिल में प्रवेश करना चाहेगा उसे सीधा सरल होना ही पड़ेगा। इसी तरह हमारा जीवन संसार में कितना ही टेड़ा मेड़ा क्यों न बना रहे, अपने आत्म-गृह में आने के लिये उसे एकदम सरल सीधा ऋजु होना ही पड़ेगा। इसी सरलता की परणति का नाम आर्जव धर्म है। ऋजुता का जो भाव है वह आर्जव है अर्थात् मन, वचन, काय की सरलता का नाम आर्जव धर्म है।

चौथे धर्म शौच धर्म कहा है। शौच धर्म पवित्रता का प्रतीक है। यह पवित्रता शुचिता संतोष के माध्यम से आती है।

पाँचवा  सत्य धर्म कहा है। कहा गया है कि सृष्टि का संचालन परमेश्वर करता है और यह भी कहा गया कि सत्य ही परमेश्वर है तो फिर क्यों न यह माना जाय कि सत्य रूप परमेश्वर से ही सृष्टि का संचालन होता है। सत्य प्रतिष्ठित है, सत्य परमेश्वर है। 
की ही फैलती है। 

छठवाँ दिन को संयम धर्म कहा है। इसे बन्धन का दिन भी कह सकते हैं। पर यह बन्धन दुःखदाई नहीं अपितु दुःखों से छुटकारा पाने के लिए वन्दन अभिनन्दन रूप है।

पर्व का साँतवा दिन को दशलक्षणों में इसे तप धर्म कहा है। दो तरह के मार्ग हैं, जिसमें एक साधन सम्पन्न, सुख सुविधा का मार्ग है मार्ग एक स्वतंत्र स्वाधीन, साधना का मार्ग है। भारतीय संस्कृति ने धर्म-मार्ग के लिये साधन सम्पन्न नहीं किन्तु साधना सम्पन्न निरूपित किया है। यहाँ भोग को नहीं योग को, त्याग को सम्मान मिला है। 

पर्व का आँठवा दिन दशलक्षणों में इसे त्याग धर्म कहा है। त्याग हमारी आत्मा को स्वस्थ और सुन्दरतम बनाता है। नववाँ दिन को दशलक्षणों में आकिंचन्य धर्म कहा है। यह खाली होने का धर्म है। रिक्त और हल्का होने का धर्म है। यह यात्रा जो हमें निज स्वरूप तक, मुक्तिधाम तक ले जाती है उसमें हल्का और खाली होना बहुत जरूरी है।अंतिम दसवाँ दिन  दशलक्षणों में इसे ब्रह्मचर्य धर्म कहा है। आत्मा ही ब्रह्म है उस ब्रह्म स्वरूप आत्मा में चर्या करना, रमण करना सो ब्रह्मचर्य है। असल में हमारी ऊर्जा इन्द्रिय द्वारों से निरन्तर बाहर की ओर बह रही है जिससे हम क्षीण कमजोर हो रहे हैं। ब्रह्मचर्य उस ऊर्जा को केन्द्रित कर आत्म-स्फूर्ति प्रदान करता है।

पर्व के समापन के 'क्षमावाणी' का पावन पर्व मनाया जाता है। जहाँ विचार शुद्धि पर बल देता है तो वहीं वचन और व्यवहार में विनम्रता, मधुरता और समरसता लाने की भी प्रेरणा यह पर्व देता है। आत्मीयता, भाईचारे और विश्वबन्धुत्व की भावनाओं से ओतप्रोत होकर, जाने अनजाने में हुई वर्षभर की गल्तियों को स्वीकार कर क्षमा मांगना तथा क्षमा कर देना अपने भीगे विचार-परिमार्जन की कसौटी है।

पर्युषण के 2 भाग हैं- पहला तीर्थंकरों की पूजा, सेवा और स्मरण तथा दूसरा अनेक प्रकार के व्रतों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक व वाचिक तप में स्वयं को पूरी तरह समर्पित करना। इस दौरान बिना कुछ खाए और पिए निर्जला व्रत करते हैं।

इन दिनों साधुओं के लिए 5 कर्तव्य बताए गए हैं- संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, तपश्चर्या, और क्षमा-याचना। गृहस्थों के लिए भी शास्त्रों का श्रवण, तप, अभयदान, सुपात्र दान, ब्रह्मचर्य का पालन, आरंभ स्मारक का त्याग, संघ की सेवा और क्षमा-याचना आदि कर्तव्य कहे गए हैं।

पर्युषण पर्व के समापन पर 'विश्व-मैत्री दिवस' अर्थात संवत्सरी पर्व मनाया जाता है।

अंतिम दिन दिगंबर 'उत्तम क्षमा' तो वहीं श्वेतांबर अपने पंचांग के अनुसार  'मिच्छामि दुक्कड़म्' कहते हुए लोगों से क्षमा मांगते हैं। इससे मन के सभी विकारों का नाश होकर मन निर्मल हो जाता है और सभी के प्रति मैत्रीभाव का जन्म होता है।

पर्युषण पर्व जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व बुरे कर्मों का नाश करके हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान महावीर के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर हमें निरंतर और खासकर पर्युषण के दिनों में आत्मसाधना में लीन होकर धर्म के बताए गए रास्ते पर चलना चाहिए। 

(भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, पंचमी, वि. सं. 2082, तदनुसार 28 अगस्त को दिगम्बर जैन धर्मावलंबियों के पर्युषण पर्व के शुभारम्भ पर सादर समर्पित)

 डॉ आनंद सिंह राणा,
श्रीजानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत।