गरिमा के साथ मृत्यु का प्रश्न: भारत में इच्छा मृत्यु कानून की शुरुआत और वर्तमान बहस
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
right to die with dignity india
सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सख्त शर्तों के साथ दी अनुमति।
2018 में “लिविंग विल” और गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता।
हाल के मामलों से फिर चर्चा में आया इच्छा मृत्यु का कानून।
Nagpur / मानव जीवन को हमेशा सबसे मूल्यवान माना गया है, लेकिन जब कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी, स्थायी कोमा या असहनीय पीड़ा में वर्षों तक जीवन जीने को मजबूर हो जाता है, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या उसे सम्मानपूर्वक मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए। इसी सवाल से जुड़ा विषय है इच्छा मृत्यु (यूथेनेशिया), जिस पर भारत में लंबे समय से कानूनी और नैतिक बहस चल रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, लेकिन समय के साथ न्यायपालिका ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं बल्कि गरिमा के साथ जीना है। भारत में इच्छा मृत्यु पर कानूनी चर्चा की शुरुआत वास्तव में न्यायालयों के माध्यम से हुई। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया, जिसने इस विषय को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी बहस का केंद्र बना दिया। अरुणा शानबाग मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थीं, जिन पर 1973 में एक गंभीर हमला हुआ था और उसके बाद वे दशकों तक अचेत अवस्था में रहीं। इस मामले में अदालत ने सक्रिय इच्छा मृत्यु को अवैध बताया, लेकिन निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कुछ सख्त शर्तों के साथ अनुमति दी। इसका अर्थ यह था कि यदि कोई मरीज पूरी तरह असाध्य स्थिति में है और मेडिकल बोर्ड यह प्रमाणित करता है कि उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी जा सकती है। इसी फैसले को भारत में इच्छा मृत्यु के कानूनी ढांचे की पहली औपचारिक पहल माना जाता है।
इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए इस विषय को और स्पष्ट किया। अदालत ने यह माना कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार में गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। इसी फैसले में “लिविंग विल” या “एडवांस डायरेक्टिव” को मान्यता दी गई। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह तय कर सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां उसका जीवन केवल कृत्रिम उपकरणों के सहारे चल रहा हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो उसे लंबे समय तक जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाए। हालांकि शुरुआत में इस प्रक्रिया को लागू करना काफी जटिल था, क्योंकि इसमें मजिस्ट्रेट की पुष्टि और कई स्तरों की चिकित्सा समितियों की अनुमति आवश्यक थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने के निर्देश दिए ताकि अस्पतालों और परिवारों के लिए इस व्यवस्था को लागू करना व्यावहारिक हो सके। वर्तमान समय में यह विषय इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें परिवारों ने गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति मांगी है। इनमें हरीश राणा का मामला विशेष रूप से चर्चा में रहा। एक दुर्घटना के बाद वे लंबे समय तक गंभीर मस्तिष्क चोट के कारण अचेत अवस्था में रहे और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए। चिकित्सकीय रिपोर्टों में उनके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं बताई गई। ऐसी स्थिति में उनके परिवार ने अदालत से यह आग्रह किया कि उन्हें अनावश्यक पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी जाए। अदालत ने मेडिकल बोर्ड की राय और परिस्थितियों को देखते हुए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति दी, जिससे यह मामला इस कानून के व्यावहारिक उपयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।
इच्छा मृत्यु को लेकर समाज में आज भी अलग-अलग विचार मौजूद हैं। एक पक्ष का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति असहनीय पीड़ा में है और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है, तो उसे गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मिलना चाहिए। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय संवेदना का प्रश्न है। वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि जीवन ईश्वर का दिया हुआ है और किसी भी परिस्थिति में उसे समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। धार्मिक मान्यताएं, चिकित्सा नैतिकता और सामाजिक मूल्य इस बहस को और जटिल बना देते हैं। वर्तमान में भारत में सक्रिय इच्छा मृत्यु अभी भी अवैध और दंडनीय मानी जाती है, जबकि निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सख्त कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के तहत सीमित रूप में अनुमति दी गई है। हाल के वर्षों में अदालतों द्वारा प्रक्रिया को सरल बनाए जाने, “लिविंग विल” के प्रति बढ़ती जागरूकता और हरीश राणा जैसे मामलों के सामने आने के कारण यह विषय फिर से मीडिया और समाज में चर्चा का केंद्र बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में संसद यदि इस विषय पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाती है तो यह संवेदनशील मुद्दा और अधिक व्यवस्थित और स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा। फिलहाल न्यायालय के फैसले ही भारत में जीवन, अधिकार और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन बनाने का मार्ग तय कर रहे हैं।