सेक्स एजुकेशन पर भारत की तस्वीर: कहीं जागरूकता, कहीं अब भी चुप्पी

Fri 02-Jan-2026,01:34 AM IST +05:30

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सेक्स एजुकेशन पर भारत की तस्वीर: कहीं जागरूकता, कहीं अब भी चुप्पी Sex-Education
  • सेक्स एजुकेशन को “यौन स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन” के रूप में पेश करने पर जोर.

  • राज्यों में अलग-अलग नजरिया, कहीं समर्थन तो कहीं विरोध.

  • जागरूकता से शोषण, असुरक्षित व्यवहार और गलत जानकारी पर रोक संभव.

Maharashtra / Nagpur :

AGCNN / “सेक्स एजुकेशन” ,सिर्फ सेक्स के बारे में ही नहीं बल्कि “यौन स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन” के रूप में पेश करने पर जोर देता है, जिससे किशोरों को सुरक्षित, स्वस्थ और गलत जानकारियों से बचकर जीवन जीने में मदद मिलती है। कर्नाटक सरकार ने भी एक पहल के तहत कक्षा 8 से 12 तक किशोरों के लिए यौन शिक्षा (जिसे “किशोर शिक्षा” कहा जाता है) को शुरू करने का निर्णय लिया है। इस पाठ्यक्रम में गुड टच और बैड टच, साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन शोषण जैसी जानकारियां देने का प्रयास शामिल है। लेकिन कई शिक्षकों ने इसे लेकर असमंजस व्यक्त किया है और नामकरण विवाद की वजह से कुछ विरोध भी देखा गया है।

भारत में सेक्स एजुकेशन की स्थिति राज्यों में विभाजन जैसे नजर आती है। कुछ राज्यों में इसे अभी भी विरोध का सामना करना पड़ता है या पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, कुछ रिपोर्टों के अनुसार गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों ने सेक्स एजुकेशन को स्कूलों में शामिल करने से रोक रखा है और इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया है। 

यह मतभेद शिक्षा में असमानता पैदा कर रहे हैं, जिसके कारण कई युवा यौन स्वास्थ्य और सुरक्षा के महत्वपूर्ण पाठों से वंचित रह जाते हैं।
एक और पहल सरकार के राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जा रही है, जैसे कि Rashtriya Kishor Swasthya Karyakram (RKSK) और Adolescent Reproductive and Sexual Health Strategy (ARSH), जिनका लक्ष्य किशोरों को स्वास्थ्य-प्रेमी और सुरक्षित जीवन शैली के बारे में जानकारी देना और यौन स्वास्थ्य संदेश फैलाना है। लेकिन इनका प्रभाव अभी भी व्यापक और प्रभावी स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में सेक्स एजुकेशन का सही और व्यापक कार्यान्वयन न केवल यौन स्वास्थ्य समस्याओं जैसे असुरक्षित यौन व्यवहार, एचआईवी/एसटीडी संक्रमण और अनचाहे गर्भधारण की रोकथाम में मदद करेगा, बल्कि यह लैंगिक समानता और सम्मान के मूल्यों को भी प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा, बच्चों और किशोरों को यह सिखाना कि सहमति क्या है और कैसे सुरक्षित रिश्ते बनाए जाते हैं, यौन उत्पीड़न और शोषण की घटनाओं को भी रोकने में मदद कर सकता है। 

भारत में सेक्स एजुकेशन पर सामाजिक और कानूनी बहसें जारी हैं। ऐसा नहीं है कि इसे सिर्फ “पश्चिमी” कॉन्सेप्ट माना जाना चाहिए, बल्कि सुप्रीम कोर्ट जैसे उच्च न्यायालयों ने भी कहा है कि यह भारतीय मूल्यों के खिलाफ नहीं है और युवाओं को सही जानकारी देने में बेहद जरूरी भूमिका निभा सकता है। 

कुल मिलाकर, भारत में सेक्स एजुकेशन की जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन इसकी स्वीकृति, करिकुलम में समग्र समावेशन, सामाजिक समर्थन और नीति-निर्माण में अभी भी चुनौतियाँ स्पष्ट रूप से नजर आती हैं। बहुत सी पहल स्थानीय स्तर पर हो रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय रूप से व्यापक और समान रूप से लागू कार्यक्रम की आवश्यकता अब भी बनी हुई है।