संविधान से सम्मान, समाज से तिरस्कार: सेक्स वर्करों की दोहरी लड़ाई
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सेक्स वर्कर्स के मानव अधिकारों और सुरक्षा की जरूरत.
कानूनी स्थिति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश.
सामाजिक भेदभाव और जागरूकता अभियान.
Delhi / भारत में सेक्स वर्कर (यौन कर्मी) लंबे समय से सामाजिक उपेक्षा, कानूनी अस्पष्टता और मानवीय अधिकारों की अनदेखी का सामना करते आए हैं। यह विषय जितना संवेदनशील है, उतना ही जटिल भी। समाज में प्रचलित धारणाओं के उलट, सेक्स वर्क केवल नैतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि कानून, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानवाधिकारों से गहराई से जुड़ा प्रश्न है।
भारत में वेश्यावृत्ति को लेकर आम धारणा यह है कि यह पूरी तरह अवैध है, जबकि सच्चाई इससे अलग है। देश के कानून के अनुसार, किसी वयस्क व्यक्ति द्वारा अपनी सहमति से सेक्स वर्क करना सीधे तौर पर अपराध नहीं माना जाता। हालांकि, इससे जुड़ी कई गतिविधियां जैसे कोठा चलाना, दलाली करना, सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहक बुलाना, जबरन किसी को इस धंधे में धकेलना या नाबालिगों को शामिल करना—कानूनन गंभीर अपराध हैं। इन्हीं गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम लागू है।
हाल के वर्षों में न्यायपालिका ने इस विषय पर संवेदनशील रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वयस्क सेक्स वर्कर को केवल उनके पेशे के कारण परेशान नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि सहमति से काम करने वाले यौन कर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा की जाए। कोर्ट का मानना है कि हर नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो।
देश के बड़े शहरों में कई रेड लाइट इलाके मौजूद हैं, जहां हजारों महिलाएं और कुछ पुरुष इस पेशे से जुड़े हैं। कोलकाता का सोनागाछी, मुंबई का कमाठीपुरा, दिल्ली का जीबी रोड और नागपुर का गंगा-जमुना क्षेत्र इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इन इलाकों में रहने वाले सेक्स वर्कर अक्सर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, हिंसा, पुलिसिया उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याओं से जूझते हैं। एचआईवी और अन्य यौन रोगों का खतरा भी इनके बीच अधिक रहता है, हालांकि कई स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों से जागरूकता और जांच की सुविधाएं बढ़ी हैं।
सेक्स वर्क के पीछे की वजहें भी एक जैसी नहीं होतीं। गरीबी, बेरोजगारी, घरेलू हिंसा, कम उम्र में शादी, शिक्षा का अभाव और मानव तस्करी जैसे कारण बड़ी संख्या में लोगों को इस पेशे में धकेल देते हैं। कई मामलों में महिलाएं अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि मजबूरी या धोखे से यहां तक पहुंचती हैं। यही वजह है कि मानव तस्करी के खिलाफ कार्रवाई आज भी पुलिस और सामाजिक संगठनों की बड़ी चुनौती बनी हुई है।
समाज का नजरिया सेक्स वर्कर्स के लिए सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें न सिर्फ “अपराधी” या “अनैतिक” मान लिया जाता है, बल्कि सामान्य नागरिक सुविधाओं जैसे किराए पर घर, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सेवाओं में भी भेदभाव झेलना पड़ता है। कई बार उनके बच्चे भी सामाजिक तिरस्कार का शिकार होते हैं। इसके बावजूद, कई सेक्स वर्कर अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए संघर्ष करती हैं और उन्हें इस दलदल से दूर रखना चाहती हैं।
पिछले कुछ समय में कई शहरों में मानव तस्करी के रैकेट पकड़े गए हैं, जिनमें नाबालिग लड़कियों और महिलाओं को मुक्त कराया गया। ऐसे मामलों ने यह स्पष्ट किया है कि जहां एक ओर सहमति से काम करने वाले वयस्क सेक्स वर्कर हैं, वहीं दूसरी ओर संगठित अपराध और शोषण का काला सच भी मौजूद है। दोनों को एक ही नजर से देखना न तो न्यायसंगत है और न ही समाधानकारी।
अंततः, भारत में सेक्स वर्कर का मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का भी है। जरूरत इस बात की है कि समाज और व्यवस्था मिलकर शोषण, तस्करी और हिंसा के खिलाफ सख्ती दिखाएं, वहीं सहमति से काम करने वाले वयस्क यौन कर्मियों को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार प्रदान करें। तभी एक संतुलित और मानवीय समाधान संभव हो सकेगा।