सुभाषितम से पीएम का संदेश: सार्वजनिक जीवन में सौम्य वाणी की अहमियत
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प्रधानमंत्री ने सुभाषितम के जरिए सार्वजनिक जीवन में सौम्य वाणी, संयम और संवाद को लोकतांत्रिक मर्यादा का आधार बताया।
मर्यादित भाषा से असहमति भी सार्थक संवाद में बदलती है, जबकि तीखी वाणी सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाती है।
नेताओं और युवाओं से सोशल मीडिया सहित सभी मंचों पर जिम्मेदार, शालीन और लोककल्याणकारी भाषा अपनाने का आह्वान।
Delhi/ प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक सार्वजनिक संबोधन के दौरान “सुभाषितम” के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में सौम्य वाणी, संयम और संवाद की शक्ति पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में विश्वास, सौहार्द और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को मजबूत करने का साधन होते हैं। सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए वाणी का संतुलन उतना ही आवश्यक है जितना नीतियों का विवेकपूर्ण निर्माण।
प्रधानमंत्री ने भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि सुभाषित- अर्थात् सुसंस्कृत, सारगर्भित और लोककल्याणकारी कथन, पीढ़ियों से समाज को दिशा देते आए हैं। ऐसे कथन कठोर स्थितियों में भी समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है, किंतु असहमति का स्वर सौम्य हो तो संवाद टूटता नहीं, बल्कि सशक्त होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक जीवन में भाषा का असर दूरगामी होता है। नेताओं, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के शब्द समाज के व्यवहार, मीडिया विमर्श और डिजिटल स्पेस की संस्कृति को प्रभावित करते हैं। तीखी और अपमानजनक भाषा सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाती है, जबकि मर्यादित वाणी विश्वास और सहभागिता को बढ़ावा देती है। प्रधानमंत्री ने युवाओं से भी आग्रह किया कि वे सोशल मीडिया सहित सभी मंचों पर जिम्मेदार भाषा अपनाएं।
कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि सौम्य वाणी संकट के समय में भी सहयोग और समाधान का वातावरण बनाती है। उन्होंने प्रशासनिक संवाद, संसद की कार्यवाही और सार्वजनिक बहसों में शालीनता को लोकतंत्र की रीढ़ बताया। साथ ही, उन्होंने संस्थानों से प्रशिक्षण और आचार-संहिता के जरिए संवाद कौशल को सुदृढ़ करने का आह्वान किया।
अंत में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत संवाद, सहिष्णुता और करुणा पर आधारित है। यदि सार्वजनिक जीवन में सुभाषितम की भावना को अपनाया जाए, तो नीति-निर्माण अधिक समावेशी होगा और समाज में विश्वास का सेतु मजबूत होगा। यह संदेश केवल राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे नागरिक जीवन के लिए मार्गदर्शक है।