यूनिकॉर्न रिलेशनशिप पर बढ़ी बहस: आधुनिक रिश्तों की नई परिभाषा या सामाजिक मूल्यों के लिए चुनौती
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यूनिकॉर्न रिलेशनशिप पर समाज में बढ़ती बहस.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम पारंपरिक सामाजिक मूल्य.
कानूनी और नैतिक पहलुओं पर अलग-अलग राय.
Delhi / आधुनिक समाज में रिश्तों की परिभाषा तेजी से बदल रही है और पारंपरिक वैवाहिक ढांचे के साथ-साथ कई नए प्रकार के संबंध चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में लिव-इन रिलेशनशिप के बाद अब “यूनिकॉर्न रिलेशनशिप” जैसे शब्द सोशल मीडिया और शहरी जीवनशैली की चर्चाओं में सामने आने लगे हैं। सामान्य तौर पर इस अवधारणा में एक दंपति अपनी सहमति से किसी तीसरे व्यक्ति को अपने निजी रिश्ते का हिस्सा बनने की अनुमति देता है। इस तीसरे व्यक्ति को प्रचलित भाषा में “यूनिकॉर्न” कहा जाता है। यह व्यवस्था पूरी तरह से आपसी सहमति और निजी समझ पर आधारित बताई जाती है, लेकिन इसके सामाजिक, नैतिक और कानूनी पहलुओं को लेकर बहस तेज हो गई है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि वैश्वीकरण, इंटरनेट संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती भावना ने रिश्तों के नए मॉडल को जन्म दिया है, जिनमें लोग पारंपरिक विवाह के अलावा अन्य विकल्पों पर भी विचार करने लगे हैं। हालांकि भारत जैसे समाज में जहां परिवार और विवाह की पारंपरिक व्यवस्था बेहद मजबूत मानी जाती है, वहां इस तरह की अवधारणाएं लोगों को चौंकाती भी हैं और कई बार विवाद भी पैदा करती हैं। सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जहां कुछ लोग इसे निजी स्वतंत्रता का हिस्सा मानते हैं, वहीं बड़ी संख्या में लोग इसे भारतीय सामाजिक मूल्यों के विपरीत बताते हैं।
दूसरी ओर कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का कानून मुख्य रूप से सहमति और वैधानिक विवाह की परिधि में रिश्तों को देखता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्तों को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समाज के सभी वर्ग इन बदलावों को आसानी से स्वीकार कर लें। परिवार व्यवस्था, बच्चों के पालन-पोषण और सामाजिक संतुलन जैसे कई पहलुओं को लेकर चिंताएं भी सामने आती रहती हैं। कुछ सामाजिक संगठनों और विचारकों का कहना है कि आधुनिकता के नाम पर रिश्तों की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं, जिससे पारिवारिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि व्यक्तिगत जीवन से जुड़े फैसले व्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं और समाज को इस पर कठोर निर्णय थोपने से बचना चाहिए। इस पूरे विवाद के बीच एक और मांग समय-समय पर सामने आती है कि पुरुषों से जुड़े अधिकारों और मुद्दों पर भी संस्थागत चर्चा होनी चाहिए, ताकि पारिवारिक और वैवाहिक विवादों में संतुलित दृष्टिकोण विकसित हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय में रिश्तों को लेकर खुली बहस, सामाजिक संवाद और स्पष्ट कानूनी समझ ही ऐसे संवेदनशील विषयों पर संतुलित रास्ता निकाल सकती है।