लौह अयस्क अपशिष्ट से बनेंगी सड़कें, CSIR-CRRI और AMNS इंडिया समझौता
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हर साल 18-20 मिलियन टन उत्पन्न होने वाले लौह अयस्क अपशिष्ट को सड़क निर्माण में उपयोग कर पर्यावरणीय समस्याओं और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम किया जा सकेगा।
इस पहल के तहत वैज्ञानिक परीक्षण, सड़क डिजाइन अध्ययन और तकनीकी विश्लेषण कर हरित एवं टिकाऊ अवसंरचना निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा।
New Delhi/ भारत में सतत और हरित अवसंरचना को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर CSIR-Central Road Research Institute और ArcelorMittal Nippon Steel India के बीच एक महत्वपूर्ण अनुसंधान एवं विकास समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस सहयोग का उद्देश्य सड़क निर्माण में लौह अयस्क के अपशिष्ट पदार्थों के उपयोग की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। यह पहल चक्रीय अर्थव्यवस्था और अपशिष्ट से संसाधन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देश के प्रमुख सड़क अनुसंधान संस्थान CSIR-Central Road Research Institute (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और इस्पात क्षेत्र की अग्रणी कंपनी ArcelorMittal Nippon Steel India के बीच अनुसंधान एवं विकास सहयोग समझौता किया गया। इस समझौते का उद्देश्य सड़क निर्माण में लौह अयस्क के अपशिष्ट पदार्थों के उपयोग को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन करना और सतत अवसंरचना विकास को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की सचिव और सीएसआईआर की महानिदेशक N. Kalaiselvi ने हरित अवसंरचना निर्माण में चक्रीय अर्थव्यवस्था की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लौह अयस्क के अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग सड़क निर्माण में किया जाए तो इससे पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने के साथ-साथ टिकाऊ विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित लौह अयस्क शोधन संयंत्रों से हर साल लगभग 18 से 20 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इन अपशिष्टों को आमतौर पर ‘स्लाइम’ कहा जाता है, जिन्हें बड़े बांधों में संग्रहित किया जाता है। इतनी बड़ी मात्रा में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट पर्यावरण और आर्थिक दोनों दृष्टियों से चुनौती पैदा करते हैं।
नए समझौते के तहत सीएसआईआर-सीआरआरआई के वैज्ञानिक विभिन्न प्रयोगशाला परीक्षण, सामग्री विश्लेषण और सड़क डिजाइन अध्ययन करेंगे। इन अध्ययनों के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि सड़क निर्माण की अलग-अलग परतों में लौह अयस्क के अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग किस प्रकार सुरक्षित और प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक समुच्चय (नैचुरल एग्रीगेट) की मांग भी कम होगी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में Arvind Bodhankar उपस्थित थे, जो ArcelorMittal Nippon Steel India के मुख्य सतत विकास अधिकारी हैं। उन्होंने उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच साझेदारी को सतत विकास की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार इस तरह के सहयोग से औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग के नए रास्ते खुलेंगे और हरित अवसंरचना निर्माण को गति मिलेगी।
इस अवसर पर Chaudhary Ravi Shekhar, निदेशक, CSIR-Central Road Research Institute ने कहा कि संस्थान अगली पीढ़ी की टिकाऊ सड़क तकनीकों के विकास के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि यह सहयोग लौह अयस्क अपशिष्टों के वैज्ञानिक परीक्षण और फील्ड स्तर पर प्रदर्शन को संभव बनाएगा, जिससे टिकाऊ सड़क निर्माण में भारत की क्षमता और मजबूत होगी।
इस परियोजना का नेतृत्व सीएसआईआर-सीआरआरआई के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख Satish Pandey कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि व्यवस्थित अनुसंधान और प्रयोगशाला परीक्षणों के माध्यम से लौह अयस्क अपशिष्टों को सड़क निर्माण के लिए मिट्टी और प्राकृतिक समुच्चय के विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकता है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस कार्यक्रम में संस्थान द्वारा विकसित कई नई तकनीकों का प्रदर्शन भी किया गया। इनमें कृषि अपशिष्ट आधारित बायो-बिटुमेन, स्टील स्लैग आधारित गड्ढा मरम्मत तकनीक ‘इकोफिक्स’, स्लैग और फ्लाई ऐश आधारित टेरासर्फेसिंग तकनीक और सड़क निर्माण के लिए अपशिष्ट प्लास्टिक आधारित मॉड्यूलर जियोसेल शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन तकनीकों से न केवल सड़क निर्माण अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनेगा, बल्कि औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग से संसाधनों का बेहतर प्रबंधन भी संभव हो सकेगा।