डायरिया की त्वरित पहचान के लिए स्वदेशी DQ किट: बच्चों के इलाज में बड़ी राहत

Mon 09-Mar-2026,05:27 PM IST +05:30

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डायरिया की त्वरित पहचान के लिए स्वदेशी DQ किट: बच्चों के इलाज में बड़ी राहत Indigenous-DQ-Diagnostic-Kit-Childhood-Diarrhea-India
  • भारत में विकसित डायक्यू डायग्नोस्टिक किट बच्चों में जीवाणु और गैर-जीवाणु दस्त की पहचान कुछ ही मिनटों में कर सकती है, जिससे समय पर उपचार संभव होगा।

  • लैटरल फ्लो एसे और स्वर्ण नैनोकण तकनीक पर आधारित यह स्वदेशी किट ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में भी बिना जटिल प्रयोगशाला उपकरण के उपयोग की जा सकेगी।

Delhi / New Delhi :

Delhi/ केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) ने ओडिशा के कटक स्थित बेबीक्यू प्राइवेट लिमिटेड को बच्चों में होने वाले अतिसार की त्वरित जांच के लिए एक स्वदेशी डायग्नोस्टिक उपकरण विकसित करने की परियोजना हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की है। इस परियोजना का उद्देश्य ऐसी किफायती और तेजी से परिणाम देने वाली जांच किट को व्यावसायिक रूप देना है, जो बच्चों में जीवाणु और गैर-जीवाणु दस्त के बीच सटीक अंतर कर सके।

प्रस्तावित उत्पाद “डायक्यू डायग्नोस्टिक किट” जैव प्रौद्योगिकी और पदार्थ विज्ञान के संयोजन से विकसित एक अभिनव तकनीक है। यह किट विशेष रूप से बच्चों में दस्त की व्यापक समस्या को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इसका उपयोग ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और अस्थायी जांच केंद्रों में भी आसानी से किया जा सकेगा।

डायक्यू उपकरण लैटरल फ्लो एसे (LFA) तकनीक पर आधारित है, जिसमें रोग-विशिष्ट मल बायोमार्कर का उपयोग कर तेजी से संक्रमण की पहचान की जाती है। इसमें स्वर्ण नैनोकण आधारित रंगमितीय पहचान प्रणाली का प्रयोग किया गया है, जिससे बिना किसी उन्नत प्रयोगशाला उपकरण के परिणामों को आसानी से देखा जा सकता है। इस तकनीक में विशेष रूप से विकसित प्रोप्राइटरी बायोमार्कर और अभिकर्मकों का उपयोग किया गया है, जो संक्रमण की उच्च संवेदनशीलता और विशिष्टता के साथ पहचान सुनिश्चित करते हैं।

इस जांच प्रक्रिया में ताजा मल का नमूना लेकर उसे एक्सट्रैक्शन बफर के साथ मिलाया जाता है। इसके बाद तैयार घोल को एलएफए स्ट्रिप पर डाला जाता है, जहां यह अभिकर्मकों के साथ प्रतिक्रिया कर रंग परिवर्तन उत्पन्न करता है। स्ट्रिप पर बनने वाली रंगीन रेखाएं यह संकेत देती हैं कि संक्रमण जीवाणु है या गैर-जीवाणु। पूरी प्रक्रिया कुछ ही मिनटों में परिणाम दे देती है।

इस तकनीक का विकास हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (NIPER) के सहयोग से किया गया है और इसका चिकित्सकीय सत्यापन ईएसआईसी अस्पताल, हैदराबाद में किया गया है। इस विशेष बायोमार्कर तकनीक को अंतरराष्ट्रीय पेटेंट भी प्राप्त है।

प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि स्वदेशी त्वरित निदान तकनीकें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि इस किट के व्यावसायीकरण से सुलभ और किफायती स्वास्थ्य समाधान उपलब्ध होंगे, जो बच्चों में होने वाले अतिसार जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में सहायक साबित होंगे।