रेल पटरियों पर हाथियों की मौत रोकने को राष्ट्रीय रणनीति

Thu 12-Mar-2026,12:40 PM IST +05:30

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रेल पटरियों पर हाथियों की मौत रोकने को राष्ट्रीय रणनीति Elephant-Deaths-Railway-Tracks-India-Policy-Workshop
  • देहरादून में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में हाथियों की रेलवे ट्रैक पर बढ़ती मौतों को रोकने के लिए वैज्ञानिक रणनीतियों और तकनीकी समाधान पर चर्चा की गई।

  • एआई आधारित चेतावनी प्रणाली, सेंसर तकनीक और वन्यजीव-अनुकूल अवसंरचना से हाथी-ट्रेन टक्कर कम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रणनीति तैयार की जा रही है।

Delhi / New Delhi :

New Delhi/ देश में रेल पटरियों पर हाथियों की बढ़ती मृत्यु दर को रोकने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत Project Elephant डिविजन ने Wildlife Institute of India के सहयोग से 10 और 11 मार्च 2026 को देहरादून में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। यह कार्यक्रम भारतीय वन्यजीव संस्थान के परिसर में आयोजित हुआ, जिसमें वन्यजीव संरक्षण, रेलवे अवसंरचना और वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया।

कार्यशाला में पर्यावरण मंत्रालय, Ministry of Railways (India), हाथी-बहुल राज्यों के वन विभागों और संरक्षण वैज्ञानिकों सहित लगभग 40 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें देश के कई प्रमुख रेलवे जोनों जैसे पूर्वी मध्य रेलवे, पूर्वी तट रेलवे, उत्तर पूर्वी रेलवे, उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे, उत्तरी रेलवे, दक्षिण पूर्वी रेलवे, दक्षिणी रेलवे और दक्षिण पश्चिमी रेलवे के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में विश्व की एशियाई हाथी आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाया जाता है। ये हाथी मुख्य रूप से पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी और मध्य भारत के जंगलों में रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जंगलों के विखंडन और रेलवे नेटवर्क के विस्तार के कारण हाथियों और ट्रेनों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ी हैं। विशेष रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में यह समस्या अधिक देखी गई है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण मंत्रालय, डब्ल्यूआईआई और रेलवे मंत्रालय ने मिलकर हाथियों के आवास क्षेत्रों में स्थित 110 संवेदनशील रेलवे खंडों की पहचान की है। इसके अलावा बाघ आवास वाले दो राज्यों में 17 अतिरिक्त रेलवे खंडों को भी चिन्हित किया गया है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता है।

संयुक्त सर्वेक्षणों के दौरान विशेषज्ञों ने इन क्षेत्रों की पारिस्थितिक परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन किया। कुल 3,452.4 किलोमीटर लंबाई में फैले 127 रेलवे खंडों का आकलन किया गया। इस अध्ययन के आधार पर 14 राज्यों में फैले 1,965.2 किलोमीटर के 77 रेलवे खंडों को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है, जहां तत्काल शमन उपाय लागू करने की जरूरत है।

इन क्षेत्रों में वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कई संरचनात्मक और तकनीकी उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। विशेषज्ञों ने 503 रैंप और लेवल क्रॉसिंग, 72 पुलों के विस्तार या संशोधन, 39 बाड़ या खाई संरचनाओं, 4 निकास रैंप, 65 नए अंडरपास और 22 ओवरपास बनाने की सिफारिश की है। कुल मिलाकर 705 ऐसी संरचनाएं प्रस्तावित की गई हैं, जिनका उद्देश्य हाथियों और अन्य वन्यजीवों को सुरक्षित रूप से रेलवे ट्रैक पार करने में मदद करना है।

इसके अलावा नई रेलवे परियोजनाओं में भी वन्यजीव-अनुकूल ढांचे को शामिल किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ में अचानकमार-अमरकंटक हाथी गलियारे से गुजरने वाली गेवरा रोड–पेंड्रा रोड रेलवे लाइन, महाराष्ट्र में दरेकासा–सालेकासा रेलवे ट्रैक का तिहरीकरण और नागभिड़–इतवारी गेज रूपांतरण परियोजना में विशेष सुरक्षा उपाय जोड़े गए हैं।

असम में अजारा–कामाख्या रेलवे लाइन के एक संवेदनशील 3.5 किलोमीटर लंबे हिस्से को ऊंचा उठाने की योजना भी बनाई गई है। यह हिस्सा रानी–गरभंगा–दीपोर बील हाथी गलियारे से गुजरता है, जहां पहले कई हाथियों की मौत हो चुकी है। इस परियोजना का उद्देश्य हाथियों को सुरक्षित मार्ग प्रदान करना है।

तकनीकी समाधान भी इस समस्या से निपटने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों ने डिस्ट्रीब्यूटेड एकॉस्टिक सिस्टम आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (IDS) को एक महत्वपूर्ण नवाचार बताया है। यह प्रणाली रेलवे ट्रैक के आसपास हाथियों की गतिविधि का पता लगाकर अधिकारियों को चेतावनी देती है। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत असम में 64 किलोमीटर के हाथी गलियारे और 141 किलोमीटर रेलवे खंड पर इसका पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा है।

इसके अलावा तमिलनाडु के मदुक्कराई क्षेत्र में एआई आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली भी लागू की गई है। इसमें थर्मल और मोशन सेंसर से लैस 12 कैमरे लगे हैं, जो ट्रैक के आसपास हाथियों की गतिविधि का पता लगाते हैं और तुरंत वन एवं रेलवे अधिकारियों को अलर्ट भेजते हैं। इससे ट्रेनों की गति कम करने और दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलती है।

कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने हाथी पारिस्थितिकी, वन्यजीव गलियारों, भूमि उपयोग परिवर्तन और ट्रेनों की गति जैसे कारकों पर भी विस्तृत चर्चा की। साथ ही जीआईएस निगरानी, सेंसर तकनीक, सामुदायिक निगरानी और बेहतर डेटा साझाकरण जैसी रणनीतियों पर जोर दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग, रेलवे और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए ही हाथी-ट्रेन टक्करों को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। इस कार्यशाला से एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं, जो भविष्य में वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षित रेलवे संचालन के बीच संतुलन बनाने में मदद करेंगे।