भारत में राजनीति और जलवायु परिवर्तन: नेतृत्व सतत विकास और नेट-जीरो नीतियों पर
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भारत में राजनीति और जलवायु परिवर्तन का गहरा संबंध, 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य का असर राजनीतिक नीतियों पर।
डॉ. अतुल मलिकराम जैसे रणनीतिकारों ने कार्बन क्रेडिट और ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग को चुनावी रणनीति में शामिल किया।
Delhi/ भारत में पर्यावरण और राजनीति का जुड़ाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह संदेश दिया कि विकास का मतलब प्रकृति का विनाश नहीं है। उनके कार्यकाल में पर्यावरण कूटनीति को नई दिशा मिली। वर्तमान में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा, रिन्यूएबल एनर्जी और सतत जीवनशैली के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है।
भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्विनी कुमार चौबे ने परंपराओं और आधुनिक पर्यावरण नीतियों के संतुलन की वकालत की। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे कानून, शिक्षा और जन भागीदारी के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
राजनीति में इको-पॉलिटिक्स की बढ़ती अहमियत राज्यों में भी दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ग्रीन प्रोजेक्ट्स और रिवर फ्रंट परियोजनाओं पर जोर देकर दिखाया कि क्षेत्रीय राजनीति में भी पर्यावरण का महत्व बढ़ा है। वहीं अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता जताते हुए इसे एक नागरिक आंदोलन में बदलने की आवश्यकता बताई।
चुनावी रणनीतिकारों ने भी इस बदलाव को भांप लिया है। डॉ. अतुल मलिकराम जैसे रणनीतिकार, जिन्होंने कार्बन फुटप्रिंट और ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग में अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन हासिल किया है, यह संकेत देते हैं कि भविष्य की चुनावी रणनीतियों में पर्यावरण नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। अब नेताओं की जनता द्वारा मूल्यांकन उनके द्वारा लगाए गए पेड़, कम किए गए कार्बन उत्सर्जन और ग्रीन प्रोजेक्ट्स के आधार पर होगा।
इस बदलते राजनीतिक माहौल में कार्बन क्रेडिट, ग्रीनहाउस गैस कम करना और सतत विकास केवल शब्द नहीं रह गए हैं। जयराम रमेश से लेकर डॉ. मलिकराम तक विभिन्न नेताओं और विशेषज्ञों द्वारा पर्यावरण नीति की समझ विकसित की जा रही है। आने वाले दशकों में भारत के लिए ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता होगी जो आर्थिक विकास के साथ-साथ धरती को सुरक्षित बनाए रखने में सहायक हों। इस बदलते परिदृश्य का मुख्य संदेश यह है कि राजनीति और पर्यावरण अब अलग नहीं हैं। भविष्य में नेता तभी सफल होंगे जब वे विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना जानेंगे।