यूपी पंचायत चुनाव में देरी पर हाई कोर्ट सख्त, राज्य निर्वाचन आयोग से मांगा जवाब
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UP Panchayat Election Delay
पंचायत चुनाव में देरी पर हाई कोर्ट सख्त.
आयोग से मांगा गया विस्तृत जवाब.
संवैधानिक समयसीमा पर उठे सवाल.
Prayagraj / उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर अब मामला न्यायालय तक पहुंच गया है। चुनाव की प्रक्रिया शुरू न होने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंगलवार को सख्त रुख अपनाते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब तलब किया है। अदालत ने आयोग से पूछा है कि पंचायत चुनाव संवैधानिक समय सीमा के भीतर क्यों नहीं कराए जा रहे हैं और क्या निर्धारित समय के भीतर पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराई जा सकेगी या नहीं।
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका के जरिए सामने आया है। इस याचिका को इम्तियाज हुसैन नामक याचिकाकर्ता ने दायर किया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से पंचायत चुनाव की तैयारियों और वर्तमान स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी देने को कहा। अदालत ने यह भी पूछा कि चुनाव कराने में देरी के पीछे क्या कारण हैं और आयोग इस दिशा में क्या कदम उठा रहा है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि संविधान के अनुच्छेद 243E के अनुसार किसी भी पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से अधिकतम पांच वर्ष तक ही सीमित होता है। इसके बाद पंचायत का कार्यकाल बढ़ाया नहीं जा सकता। इसलिए यह अनिवार्य है कि कार्यकाल समाप्त होने से पहले या उसके तुरंत बाद चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। याचिका में कहा गया कि यदि समय पर चुनाव नहीं कराए जाते हैं तो यह संविधान की भावना के विपरीत होगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से भी अदालत में अपना पक्ष रखा गया। आयोग की तरफ से कहा गया कि पंचायत चुनाव से जुड़ी अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया केवल आयोग के स्तर पर तय नहीं होती, बल्कि इसमें राज्य सरकार की भी भूमिका होती है। आयोग ने अदालत को बताया कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12BB के तहत ग्राम प्रधान के सामान्य चुनाव या उपचुनाव की तारीख तय करने के लिए अधिसूचना जारी करना राज्य सरकार का दायित्व होता है। यह अधिसूचना राज्य निर्वाचन आयोग के परामर्श से जारी की जाती है।
आयोग के इस तर्क के बाद अदालत ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए यह स्पष्ट करने को कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू करने में आखिर किस स्तर पर देरी हो रही है। अदालत ने आयोग से कहा कि वह आगामी सुनवाई में पंचायत चुनाव की तैयारियों की पूरी स्थिति स्पष्ट करे और यह भी बताए कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार चुनाव कब तक कराए जा सकते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पंचायत चुनाव ग्रामीण लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है, क्योंकि इसके जरिए गांव स्तर पर जनप्रतिनिधियों का चयन होता है। पंचायतों के माध्यम से ही ग्रामीण विकास योजनाओं का संचालन और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई जाती हैं।
राज्य में पिछला पंचायत चुनाव वर्ष 2021 में कराया गया था। ऐसे में पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने की समय सीमा नजदीक आने लगी है। यही वजह है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायत चुनाव समय पर कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे स्थानीय शासन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहती है।
अब इस मामले में सभी की नजरें इलाहाबाद हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि अदालत चुनाव प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट समयसीमा तय करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार से विस्तृत जवाब मांग सकती है। यदि अदालत को संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो संभव है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर सख्त निर्देश भी जारी किए जाएं।
फिलहाल यह मामला प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि पंचायत चुनाव की देरी सीधे तौर पर ग्रामीण लोकतंत्र से जुड़ा मुद्दा है।