लिवर रोग के इलाज में नई उम्मीद: वैज्ञानिकों ने विकसित किया इंजेक्टेबल “सैटेलाइट लिवर”

Mon 16-Mar-2026,11:52 AM IST +05:30

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लिवर रोग के इलाज में नई उम्मीद: वैज्ञानिकों ने विकसित किया इंजेक्टेबल “सैटेलाइट लिवर” Injectable Liver Therapy
  • एमआईटी वैज्ञानिकों ने इंजेक्टेबल “सैटेलाइट लिवर” तकनीक विकसित की।

  • यह तकनीक लिवर के कई जरूरी कार्यों को पूरा करने में मदद कर सकती है।

  • भविष्य में इससे लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत कम हो सकती है।

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / गंभीर लिवर रोगों के इलाज की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थान Massachusetts Institute of Technology (एमआईटी) के इंजीनियरों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में “सैटेलाइट लिवर” डाला जा सकता है। यह सैटेलाइट लिवर शरीर के अंदर एक छोटे बैकअप अंग की तरह काम करता है और लिवर के कई जरूरी कार्यों को पूरा करने में मदद कर सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। इस शोध का नेतृत्व प्रसिद्ध बायोइंजीनियर Sangeeta Bhatia ने किया है और इसके परिणाम वैज्ञानिक जर्नल Cell Biomaterials में प्रकाशित किए गए हैं।

दरअसल मानव शरीर में लिवर सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और यह लगभग 500 से अधिक जैविक कार्यों को नियंत्रित करता है। इसमें शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालना, प्रोटीन और एंजाइम बनाना, ऊर्जा का भंडारण करना और पाचन से जुड़े कई कार्य शामिल हैं। जब किसी व्यक्ति का लिवर गंभीर रूप से खराब हो जाता है तो अक्सर लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र इलाज बचता है। हालांकि पूरी दुनिया में डोनर अंगों की भारी कमी है, जिसके कारण कई मरीजों को समय पर ट्रांसप्लांट नहीं मिल पाता। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने इंजेक्टेबल “सैटेलाइट लिवर” तकनीक विकसित की है, जो शरीर के अंदर छोटे सहायक अंग की तरह काम कर सकती है।

इस नई तकनीक में मुख्य रूप से लिवर की प्रमुख कोशिकाओं यानी हेपेटोसाइट्स का उपयोग किया गया है। वैज्ञानिकों ने इन कोशिकाओं को हाइड्रोजेल माइक्रोस्फीयर नामक सूक्ष्म संरचनाओं के साथ मिलाकर एक खास प्रकार का इंजेक्टेबल टिशू तैयार किया। जब इस मिश्रण को इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में डाला जाता है, तो यह धीरे-धीरे एक ठोस संरचना का रूप ले लेता है। इसके बाद इसमें मौजूद कोशिकाएं जीवित रहकर सक्रिय रूप से काम करने लगती हैं और लिवर के कई महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा करने में मदद करती हैं। इस संरचना में फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएं भी शामिल की गई हैं, जो नई रक्त वाहिकाओं के विकास में सहायक होती हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि इंजेक्ट किए गए टिशू को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण मिलता रहे।

वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर किया, जिसमें इन मिनी लिवर टिशू को पेट के फैटी टिशू में इंजेक्ट किया गया। प्रयोग के दौरान पाया गया कि इंजेक्शन के बाद कोशिकाएं व्यवस्थित होकर एक छोटे लिवर टिशू का निर्माण करने लगीं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह टिशू कम से कम आठ सप्ताह तक जीवित और सक्रिय बना रहा। इस दौरान इसने लिवर द्वारा बनाए जाने वाले जरूरी प्रोटीन और एंजाइम भी तैयार किए, जो इस तकनीक की सफलता का संकेत है। इससे यह साबित हुआ कि इंजेक्ट किए गए सैटेलाइट लिवर शरीर के अंदर कार्य करने में सक्षम हैं और लिवर की कुछ महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं को पूरा कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में यह तकनीक मनुष्यों पर भी सफल साबित होती है, तो यह गंभीर लिवर रोगों के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है जिन्हें तुरंत लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है लेकिन समय पर डोनर अंग उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में सैटेलाइट लिवर अस्थायी रूप से शरीर के महत्वपूर्ण कार्यों को संभाल सकता है और मरीज को तब तक जीवित रख सकता है जब तक उसे उपयुक्त डोनर न मिल जाए।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को मनुष्यों में उपयोग करने से पहले अभी कई और परीक्षण और शोध किए जाने की जरूरत है। इसके बावजूद शुरुआती परिणाम काफी उत्साहजनक माने जा रहे हैं। यदि यह तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में लिवर रोगों के इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है और लाखों मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकता है।