“पीरियड्स प्राकृतिक हैं, कलंक नहीं” राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाया मेंस्ट्रुअल हाइजीन का मुद्दा
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Raghav Chadha Menstrual Hygiene Speech
राज्यसभा में राघव चड्ढा ने पीरियड्स से जुड़े सामाजिक कलंक पर उठाई आवाज.
स्कूलों में सैनिटरी पैड और साफ पानी की सुविधा की मांग.
मेंस्ट्रुअल हाइजीन पर जागरूकता बढ़ाने की अपील.
Delhi / महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय को संसद में प्रमुखता से उठाते हुए Raghav Chadha ने राज्यसभा में मेंस्ट्रुअल हाइजीन और पीरियड्स से जुड़े सामाजिक कलंक पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पीरियड्स महिलाओं के जीवन की एक स्वाभाविक और जैविक प्रक्रिया है, लेकिन समाज में इसे लेकर अब भी झिझक, चुप्पी और शर्म जैसी मानसिकता मौजूद है। चड्ढा ने अपने संबोधन में कहा कि “Periods are natural, stigma is not”, यानी पीरियड्स प्राकृतिक हैं, लेकिन उनसे जुड़ा सामाजिक कलंक प्राकृतिक नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर खुलकर बात करने की जरूरत है ताकि महिलाओं और किशोरियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मानजनक माहौल मिल सके।
सांसद ने यह भी कहा कि भारत के कई हिस्सों में आज भी ऐसी स्थिति है जहां लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पातीं। उन्होंने इसे किसी एक लड़की की व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि पूरे समाज की सामूहिक विफलता बताया। चड्ढा के अनुसार अगर किसी छात्रा को केवल इसलिए शिक्षा से वंचित होना पड़ता है क्योंकि स्कूल में सैनिटरी पैड, साफ पानी या पर्याप्त निजता की व्यवस्था नहीं है, तो यह शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सोच दोनों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन केवल स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, समान अवसर और महिलाओं की गरिमा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
अपने वक्तव्य में उन्होंने समाज की सोच पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि देश में शराब और सिगरेट जैसे उत्पाद खुलेआम बिकते हैं और इनके विज्ञापन भी दिखाई देते हैं, लेकिन जब कोई महिला सैनिटरी पैड खरीदती है तो उसे अक्सर अखबार या कागज में लपेटकर दिया जाता है, मानो यह कोई ऐसी चीज हो जिसे छिपाकर रखना चाहिए। चड्ढा ने इसे सामाजिक मानसिकता का उदाहरण बताते हुए कहा कि यह स्थिति दर्शाती है कि कैसे एक सामान्य जैविक प्रक्रिया को समाज ने अनावश्यक वर्जना और शर्म से जोड़ दिया है।
सांसद ने यह भी कहा कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर जागरूकता बढ़ाना समय की जरूरत है। उन्होंने सरकार और समाज दोनों से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की। उनके अनुसार स्कूलों और कॉलेजों में पर्याप्त शौचालय, साफ पानी और सैनिटरी पैड की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि छात्राओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षा संस्थानों में इस विषय पर खुली चर्चा और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे किशोरियों और किशोरों दोनों को सही जानकारी मिल सके।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत में मेंस्ट्रुअल हाइजीन अभी भी एक चुनौतीपूर्ण विषय बना हुआ है। कई ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आज भी पीरियड्स से जुड़ी भ्रांतियां और सामाजिक प्रतिबंध मौजूद हैं। इन कारणों से कई लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं या उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
चड्ढा ने अपने संबोधन के अंत में समाज से इस विषय पर चुप्पी तोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब तक पीरियड्स को सामान्य स्वास्थ्य विषय के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान संभव नहीं होगा। उनके अनुसार यह केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि वह इस विषय पर संवेदनशीलता और जागरूकता के साथ आगे आए।