संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य संस्था संगम, प्रदेश भर की संस्थाएं एक मंच पर
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Shri Jankiraman University Jabalpur
जबलपुर में आयोजित साहित्य संस्था संगम ने प्रदेश की साहित्यिक संस्थाओं को संवाद और समन्वय का साझा मंच प्रदान किया।
भारतीय चिंतन, आयातित साहित्य और तकनीक जैसे विषयों पर विद्वानों ने गहन वैचारिक विमर्श प्रस्तुत किया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पुस्तक विमोचन ने दो दिवसीय आयोजन को साहित्यिक उत्सव का स्वरूप दिया।
जबलपुर/ संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक चेतना और वैचारिक संवाद को नई दिशा देने के उद्देश्य से दो दिवसीय ‘साहित्य संस्था संगम’ का भव्य शुभारंभ हुआ। यह आयोजन मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के अंतर्गत साहित्य अकादमी, संस्कृति परिषद् द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें प्रदेश भर की सक्रिय साहित्यिक संस्थाओं ने सहभागिता की। आयोजन का उद्देश्य साहित्यिक संस्थाओं के बीच समन्वय, संवाद और तकनीकी सशक्तिकरण को बढ़ावा देना रहा।
यह साहित्यिक कुंभ श्रीजानकीरमण महाविद्यालय में आयोजित किया गया, जहां उद्घाटन सत्र दोपहर 12 बजे वंदे मातरम् गायन और सरस्वती पूजन के साथ प्रारंभ हुआ। नाट्य लोक संस्था के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुति ने वातावरण को साहित्य और संस्कृति से ओतप्रोत कर दिया।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राज्यसभा सांसद सुमित्रा बाल्मिकी ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि साहित्य का अध्ययन व्यक्ति को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि आत्मबोध और स्वदेशी चिंतन की प्रेरणा भी प्रदान करता है। उन्होंने साहित्य को समाज के नैतिक पुनर्नवीकरण का माध्यम बताया।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख कैलाश चन्द्र ने कहा कि वर्तमान युग में लोकमंगल से युक्त साहित्य का सृजन समय की आवश्यकता है। उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने पर जोर देते हुए कहा कि इससे मीडिया और समाज दोनों को सकारात्मक दिशा मिलेगी।
विशिष्ट अतिथि शासी निकाय अध्यक्ष शरदचंद्र पालन ने साहित्यिक प्रयासों को सामाजिक चेतना से जोड़ने की आवश्यकता बताई। वहीं मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे ने इस संगम को साहित्यिक संस्थाओं के बीच परस्पर सहयोग और साझा कार्यसंस्कृति का मंच बताया।
कार्यक्रम संयोजक एवं महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ने अतिथियों एवं प्रतिभागी संस्थाओं का स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजनों से श्रेष्ठ और समकालीन साहित्य सृजन को नई दिशा मिलेगी। उद्घाटन सत्र के दौरान डॉ. कौशल दुबे की पचेली साहित्य की श्रुति परंपरा पर आधारित काव्य कृति “बाबा हरे बतात ते” का लोकार्पण भी किया गया।
द्वितीय सत्र का विषय “भारतीय साहित्य में आयातित एवं भारतीय चिंतन” रहा। सत्र की अध्यक्षता आचार्य भगवत दुबे ने की। मुख्य अतिथि आचार्य हरिशंकर दुबे ने भारतीय ज्ञान परंपरा में आत्मा और परमात्मा के संबंध को रेखांकित किया। वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र बाजपेई ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साहित्य के संबंध पर विचार रखते हुए कहा कि एआई मानव संवेदनाओं का विकल्प नहीं हो सकता।
सायंकालीन सत्र में लोकगंधर्व रुद्रदत्त दुबे एवं डॉ. बैजनाथ गौतम के निर्देशन में सांस्कृतिक संध्या आयोजित हुई, जिसमें लोकसुधा संगीत गुरुकुल के कलाकारों ने शास्त्रीय और लोक संगीत की मनोहारी प्रस्तुतियां दीं। आयोजन ने साहित्य और संस्कृति के संगम को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।