हिंदी विश्वविद्यालय के 29वें स्थापनोत्सव पर डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय की दो पुस्तकों का लोकार्पण
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हिंदी विश्वविद्यालय के 29वें स्थापनोत्सव पर डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय की दो पुस्तकों का लोकार्पण
हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के 29वें स्थापनोत्सव पर डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय की संस्कृति-विमर्श और श्रीरामकृष्ण परमहंस की जीवनी पर केंद्रित पुस्तकों का लोकार्पण।
“संस्कृति-विमर्श” पुस्तक में भारतीय संस्कृति पर केंद्रित ग्यारह विद्वानों के महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं।
श्रीरामकृष्ण परमहंस की जीवनी हिन्दी साहित्य में भारतीय अध्यात्म और नवजागरण की समझ को सशक्त बनाती है।
वर्धा/ महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के 29वें स्थापनोत्सव के अवसर पर भारतीय साहित्य की वैचारिक एकता पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अकादमिक जगत के विद्वानों, शोधकर्ताओं और अतिथियों की उपस्थिति में विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन केंद्र के प्रभारी डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय की दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण किया गया, जो भारतीय ज्ञान परम्परा और सांस्कृतिक चेतना को रेखांकित करती हैं।
महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ने अपने 29वें स्थापना दिवस को अकादमिक गरिमा और बौद्धिक विमर्श के साथ मनाया। इस अवसर पर “भारतीय साहित्य में एकात्मकता” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने प्रतिष्ठित सारस्वत अतिथियों के साथ बौद्ध अध्ययन केंद्र के प्रभारी डॉ. कृष्ण चन्द पांडेय की दो पुस्तकों का लोकार्पण किया।
लोकार्पित पुस्तकों में पहली पुस्तक “संस्कृति-विमर्श” है, जो भारतीय ज्ञान परम्परा की संस्कृति-चिन्तना को केंद्र में रखती है। इस पुस्तक में संस्कृति की परिभाषा, उसके तात्त्विक स्वरूप और उसके सामाजिक-दार्शनिक आयामों पर प्रकाश डालने वाले ग्यारह महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं। इन लेखों में स्वामी करपात्री महाराज, गुरुजी गोलवलकर और पं. विद्यानिवास मिश्र जैसे विख्यात संस्कृति पुरुषों के विचारोत्तेजक निबंध शामिल हैं। पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें सभी आलेखों का एक समग्र सार-समाहार और संपादकीय भूमिका भी दी गई है, जिससे पाठक को भारतीय संस्कृति की समन्वित समझ विकसित करने में सहायता मिलती है।
डॉ. पांडेय की दूसरी पुस्तक श्रीरामकृष्ण परमहंस की जीवनी और उपदेशों पर केंद्रित है। यह कृति 19वीं शताब्दी के भारतीय नवजागरण के प्रमुख आध्यात्मिक मार्गदर्शक रामकृष्ण परमहंस को भारतीय अध्यात्म और साधना परम्परा के एक महत्वपूर्ण उन्नायक के रूप में प्रस्तुत करती है। पुस्तक में उनके जीवन के सूक्ष्मतम पहलुओं को उनके समकालीन सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश में रखकर विश्लेषित किया गया है।
यह जीवनी न केवल श्रीरामकृष्ण परमहंस के उपदेशों और साधना-पथ को रेखांकित करती है, बल्कि भारतीय धर्म, संस्कृति और ज्ञान परम्परा के सतत प्रवाह को भी उजागर करती है। विद्वानों का मानना है कि यह कृति हिन्दी साहित्य में लंबे समय से महसूस की जा रही एक महत्वपूर्ण कमी को भी पूर्ण करती है।
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने भारतीय साहित्य और संस्कृति की एकात्म परम्परा पर विस्तार से चर्चा की और डॉ. पांडेय के लेखन को समकालीन बौद्धिक विमर्श के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। यह आयोजन विश्वविद्यालय की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है, जिसके तहत भारतीय ज्ञान परम्परा को वैश्विक विमर्श से जोड़ा जा रहा है।