नारियल के रेशे से हजारों करोड़ का कारोबार! कैसे बदल रहा है ग्रामीण भारत?
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India Coir Export
भारत के कॉयर उत्पादों का निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में 6,614 करोड़ रुपये से अधिक रहा।
इस उद्योग से सात लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार मिलता है।
सरकारी योजनाएं प्रशिक्षण, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण-अनुकूल उद्यमों को बढ़ावा दे रही हैं।
New Delhi / नारियल का छिलका, जिसे अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वही आज हजारों करोड़ रुपये के उद्योग और लाखों लोगों की आजीविका का आधार बन रहा है। आखिर कैसे नारियल का रेशा ग्रामीण भारत की किस्मत बदल रहा है?
भारत अपनी पारंपरिक विरासत को आधुनिक तकनीक और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर विकास की नई इबारत लिख रहा है। इसी कड़ी में नारियल के रेशे यानी कॉयर उद्योग की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। यह उद्योग न केवल पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार कर रहा है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, महिला सशक्तिकरण और उद्यमिता को भी बढ़ावा दे रहा है।
भारत दुनिया में नारियल के रेशे और इससे बने उत्पादों के प्रमुख उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, भारतीय कॉयर उद्योग का कारोबार लगभग 16 हजार करोड़ रुपये का है। वित्त वर्ष 2025-26 में नारियल के रेशे और उससे बने उत्पादों का निर्यात 6,614 करोड़ रुपये से अधिक रहा।
आखिर क्या होता है नारियल का रेशा?
दरअसल, नारियल के बाहरी रेशेदार छिलके से प्राकृतिक कॉयर फाइबर निकाला जाता है। इसे संसाधित करके रस्सियां, चटाइयां, गद्दे, ब्रश, डोरमैट और कई अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा, कॉयर पिथ से जैविक खाद और बागवानी में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद भी बनाए जाते हैं। इस तरह नारियल के छिलके का उपयोग करके कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा रहा है।
लाखों लोगों की आजीविका का सहारा
कॉयर उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक कारीगरों को मजबूत करता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में सात लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिलता है। इनमें लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की महिलाएं बताई जाती हैं।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की कॉयर विकास योजना के माध्यम से उद्योग को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, मशीनों के विकास, बाजार विस्तार और निर्यात प्रोत्साहन में मदद दी जाती है।
पिछले 12 वर्षों की उपलब्धियों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2014-15 में कॉयर उत्पादों का निर्यात लगभग 1,630 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 6,614 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। यानी इस अवधि में निर्यात में चार गुने से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई।
इसी दौरान 68 हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया। 150 से अधिक नई मशीनों, तकनीकों और मूल्यवर्धित उत्पादों को बढ़ावा मिला। निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने में सहायता दी गई और उद्यमियों को वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया गया।
सफलता की कहानियां बनीं प्रेरणा
महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले की रंजना रामचंद्र कदम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम यानी पीएमईजीपी के तहत कॉयर इकाई स्थापित की। उनका कारखाना रस्सियां, तकिए और डोरमैट बनाता है और छह लोगों को रोजगार देता है।
केरल के कोझिकोड में सुरेंद्रन पी. के नेतृत्व वाले संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज ने कॉयर पिथ जैविक खाद के उत्पादन में प्रगति की। एक वर्ष के भीतर इस उद्यम ने 500 से अधिक ग्राहकों का आधार बनाया और 20 टन से अधिक जैविक खाद की बिक्री दर्ज की।
वहीं, आंध्र प्रदेश की अल्लम गौथमी ने प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता के सहारे अपना कॉयर व्यवसाय स्थापित किया। उनकी इकाई का वार्षिक कारोबार लगभग 35 लाख रुपये बताया गया है और इसके जरिए छह महिलाओं को रोजगार मिला है। उन्होंने लगभग 120 महिलाओं को कॉयर उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देने में भी योगदान दिया।
केरल के जी. साबू ने भी 2024 में कॉयर कताई इकाई शुरू की। उनके उद्यम से आसपास के गांवों के आठ से दस श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं।
कुल मिलाकर, कॉयर उद्योग दिखाता है कि पारंपरिक ज्ञान, नवाचार और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन मिलकर ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में ऐसे उद्योग रोजगार सृजन, निर्यात वृद्धि और समावेशी विकास के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।