पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन की जयंती: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दी श्रद्धांजलि
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K. R. Narayanan Jayanti
द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में के.आर. नारायणन को पुष्पांजलि अर्पित की।
नारायणन भारत के पहले दलित राष्ट्रपति बने और 1997 से 2002 तक पद पर रहे।
उनका सफर शिक्षा, कूटनीति, राजनीति और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण है।
New Delhi / एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाले नेता की कहानी आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है। पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन की जयंती पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। जानिए उनके जीवन की खास बातें।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन की जयंती के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति भवन में उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर उन्हें याद किया। के.आर. नारायणन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनका जीवन संघर्ष, शिक्षा, कूटनीति और सार्वजनिक सेवा की प्रेरणादायक मिसाल माना जाता है।
के.आर. नारायणन का पूरा नाम कोचेरिल रमन नारायणन था। उनका जन्म 27 अक्टूबर 1920 को तत्कालीन त्रावणकोर रियासत के उझावूर गांव में हुआ था, जो आज केरल के कोट्टायम जिले में स्थित है। उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। परिवार की सीमित आय के बावजूद उन्होंने शिक्षा हासिल करने का संकल्प नहीं छोड़ा। बताया जाता है कि स्कूल जाने के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और आर्थिक परेशानियों के कारण पढ़ाई जारी रखना भी आसान नहीं था।
नारायणन ने केरल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्हें टाटा छात्रवृत्ति की मदद से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्ययन करने का अवसर मिला। वहां उन्होंने राजनीति और अर्थशास्त्र से जुड़े विषयों का अध्ययन किया। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों ने आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की मजबूत नींव तैयार की।
वर्ष 1949 में नारायणन भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए। उन्होंने कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और राजनयिक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे चीन और अमेरिका में भारत के राजदूत भी रहे। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की उनकी समझ और कूटनीतिक अनुभव ने उन्हें देश की राजनीति में भी एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और केरल के ओट्टापलम लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीन चुनाव जीते। वर्ष 1992 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बने। इसके बाद 25 जुलाई 1997 को उन्होंने देश के राष्ट्रपति पद की शपथ ली और 2002 तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। वे भारत के पहले दलित राष्ट्रपति बने। उनका निर्वाचन भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसरों के महत्व का प्रतीक माना जाता है।
राष्ट्रपति के रूप में नारायणन ने संविधान की मर्यादा, लोकतांत्रिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय पर विशेष जोर दिया। उन्होंने गरीबों, वंचित समुदायों, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को अपने संबोधनों में प्रमुखता से उठाया। उन्होंने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है, जब समाज के प्रत्येक वर्ग को सम्मान और विकास के समान अवसर मिलें।
के.आर. नारायणन का निधन 9 नवंबर 2005 को नई दिल्ली में हुआ था। लेकिन उनके विचार, सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका और कठिन परिस्थितियों से आगे बढ़ने की उनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है।
उनकी जयंती पर दी गई श्रद्धांजलि केवल एक पूर्व राष्ट्रपति को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उन लोकतांत्रिक मूल्यों को दोहराने का भी संदेश है, जिनके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया।