क्या ईएमआई के सहारे चल रहा है भारतीय बाजार? बढ़ती किस्तें, घटती क्रय शक्ति और भविष्य की कमाई पर सवाल!

Fri 30-Oct-2026,11:07 PM IST +05:30

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क्या ईएमआई के सहारे चल रहा है भारतीय बाजार? बढ़ती किस्तें, घटती क्रय शक्ति और भविष्य की कमाई पर सवाल! India’s Market Driven by EMI
  • महंगाई और बढ़ती कीमतों के कारण उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता पर दबाव पड़ रहा है।

  • नो-कॉस्ट ईएमआई में नकद छूट, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्क की शर्तें समझना जरूरी है।

  • लगातार बढ़ती किस्तें भविष्य की आय और परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती हैं।

Uttar Pradesh / Lucknow :

Lucknow / भारतीय बाजार में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। सामान की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियां और खुदरा कारोबारी अब केवल कीमतों में छूट या आकर्षक ऑफर पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि ग्राहकों को आसान किस्तों का विकल्प भी दे रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर घरेलू उपयोग के सामान तक, खरीदारी को मासिक किस्तों में बांटने की सुविधा तेजी से सामान्य होती जा रही है। ईएमआई पर स्मार्टफोन बेचने वाले स्टोर इसका उदाहरण हैं। पहली नजर में यह उपभोक्ताओं की बढ़ती क्रय क्षमता और बाजार के विस्तार का संकेत लगता है, लेकिन इसके पीछे एक दूसरा सवाल भी है—क्या लोगों की खरीदने की क्षमता वास्तव में बढ़ रही है या बाजार को चलाने के लिए भविष्य की आमदनी का सहारा लिया जा रहा है?

कीमतों का झटका और खरीदने की घटती क्षमता
पिछले कुछ समय में महंगाई, रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव, आयात लागत और परिवहन खर्च ने कई उत्पादों की कीमतों को प्रभावित किया है। स्मार्टफोन, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले पुर्जों की लागत बढ़ने का असर अंतिम कीमत पर भी पड़ता है। इसका सीधा दबाव उपभोक्ता की जेब पर आता है। मसलन, जिस स्मार्टफोन को कोई ग्राहक पहले 40-45 हजार रुपये में खरीदने की योजना बना रहा था, उसकी कीमत बढ़कर 55-60 हजार रुपये तक पहुंच जाए तो खरीदारी का फैसला आसान नहीं रह जाता। ऐसे में वह पूरी रकम एक साथ खर्च करने के बजाय किस्तों का विकल्प चुनता है। समस्या केवल महंगे उत्पादों तक सीमित नहीं है। रोजमर्रा की जरूरतों और घरेलू खर्चों में बढ़ोतरी के कारण परिवारों के पास गैर-जरूरी खरीदारी के लिए बचने वाली रकम भी सीमित हो रही है। यानी बाजार में उत्पाद उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें खरीदने की सहज क्षमता हर उपभोक्ता के पास नहीं है।

मांग की सुस्ती और किस्तों का सहारा
जब उपभोक्ता की आय और खर्च के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो बाजार में मांग प्रभावित होना स्वाभाविक है। इस स्थिति में ईएमआई कंपनियों और विक्रेताओं के लिए बिक्री बनाए रखने का एक प्रभावी माध्यम बन जाती है। उदाहरण के तौर पर, कोई परिवार अपनी बचत से नया फ्रिज खरीदने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसे मासिक किस्तों पर खरीद सकता है। इससे कारोबारी को तत्काल बिक्री मिल जाती है और ग्राहक को उत्पाद भी उपलब्ध हो जाता है। हालांकि, इस व्यवस्था का दूसरा पहलू यह है कि आज की खरीदारी का भुगतान आने वाले कई महीनों की आय से किया जाएगा। इस तरह भविष्य में होने वाली कमाई का एक हिस्सा पहले ही खर्च के लिए तय हो जाता है। ईएमआई अपने आप में गलत नहीं है; यह बड़ी जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है। लेकिन जब इसका इस्तेमाल नियमित खरीदारी और जीवनशैली से जुड़ी वस्तुओं के लिए लगातार होने लगे, तब यह उपभोक्ता की वास्तविक आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़ा करती है।

नो-कॉस्ट ईएमआई का गणित और छिपी हुई लागत
बाजार में नो-कॉस्ट ईएमआई को इस तरह पेश किया जाता है कि ग्राहक को लगता है कि वह बिना अतिरिक्त भुगतान के महंगा सामान खरीद रहा है। लेकिन इस सुविधा की शर्तों को समझना जरूरी है। कई बार नकद भुगतान पर मिलने वाली छूट ईएमआई विकल्प में उपलब्ध नहीं होती, जबकि कुछ मामलों में प्रोसेसिंग फीस या अन्य शुल्क भी जुड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, किसी लैपटॉप की कीमत 50 हजार रुपये है और नकद भुगतान पर ग्राहक को तीन हजार रुपये की छूट मिल रही है। ईएमआई चुनने पर यदि यह छूट नहीं मिलती, तो भले ही किस्तों पर ब्याज शून्य बताया जाए, ग्राहक को वास्तविक रूप से तीन हजार रुपये अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा, एक ही समय में मोबाइल, घरेलू उपकरण और अन्य वस्तुओं की किस्तें चल रही हों तो उनका संयुक्त बोझ मासिक बजट को प्रभावित करता है। इसलिए केवल मासिक किस्त की छोटी रकम देखकर खरीदारी का निर्णय लेना समझदारी नहीं है। कुल भुगतान, शुल्क, अवधि और छूट की शर्तों को देखना भी उतना ही जरूरी है।

आज की बिक्री और कल की आमदनी का सवाल
किसी भी अर्थव्यवस्था में बाजार की मजबूती का वास्तविक आधार लोगों की आय, रोजगार और खर्च करने की क्षमता होती है। यदि बिक्री का बड़ा हिस्सा उधार या किस्तों के सहारे बढ़ रहा है, तो उसे आर्थिक समृद्धि का पूरा प्रमाण नहीं माना जा सकता। मान लीजिए, किसी परिवार की मासिक आय 60 हजार रुपये है और घर का किराया, राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा यात्रा पर पहले ही अधिकांश रकम खर्च हो जाती है। ऐसे में नया उपकरण खरीदने के लिए ली गई किस्त उसके बजट में अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है। नौकरी में अस्थिरता, अचानक चिकित्सा खर्च या आय में कमी आने पर यही किस्त परेशानी का कारण बन सकती है। कंपनियों के लिए ईएमआई बिक्री बढ़ाने का साधन है और ग्राहकों के लिए सुविधा, लेकिन किसी बाजार की दीर्घकालिक सेहत इस बात से तय होती है कि लोग अपनी नियमित आय से कितनी खरीदारी कर पा रहे हैं। यदि उपभोग को लगातार भविष्य की कमाई के भरोसे आगे बढ़ाया जाएगा, तो बाजार की चमक और आम उपभोक्ता की आर्थिक वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ सकती है।