‘वंदे मातरम्’ के 150 साल: जानिए साहित्य से राष्ट्रचेतना तक की ऐतिहासिक यात्रा!

Sat 31-Oct-2026,10:32 PM IST +05:30

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‘वंदे मातरम्’ के 150 साल: जानिए साहित्य से राष्ट्रचेतना तक की ऐतिहासिक यात्रा! Vande Mataram: 150-Year Journey
  • वंदे मातरम् की 150 वर्षों की ऐतिहासिक और साहित्यिक यात्रा।

  • स्वतंत्रता आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय गीत की मान्यता का अध्ययन।

  • अमित शाह के राज्यसभा भाषण का सार, संदर्भ और वैचारिक विश्लेषण।

Maharashtra / Nagpur :

#वंदे मातरम् के 150 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा को समझने का प्रयास है नई पुस्तक

साहित्य से स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय पहचान तक की कहानी को समेटती है ‘वंदे मातरम्: 150 वर्षों की राष्ट्रचेतना’

क्या एक साहित्यिक रचना किसी देश की आजादी की आवाज बन सकती है? क्या कुछ शब्द करोड़ों लोगों के भीतर स्वाभिमान, संघर्ष और राष्ट्रप्रेम की भावना जगा सकते हैं? और क्या डेढ़ शताब्दी पुराना एक गीत आज भी इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े नए सवाल खड़े कर सकता है? ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक यात्रा इन्हीं सवालों के बीच आगे बढ़ती है।

नई दिल्ली। भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्षों की ऐतिहासिक, साहित्यिक और वैचारिक यात्रा को समझने के उद्देश्य से एक नई पुस्तक प्रकाशित हुई है। ‘वंदे मातरम्: 150 वर्षों की राष्ट्रचेतना’ नामक इस पुस्तक का संपादन एवं विश्लेषण डॉ. धरवेश कठेरिया ने किया है। पुस्तक में वंदे मातरम् की रचना से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका, राष्ट्रीय गीत के रूप में उसकी मान्यता और समकालीन संसदीय विमर्श तक के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक की शुरुआत वंदे मातरम् के साहित्यिक उद्भव और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के योगदान से होती है। इसमें वर्ष 1875 में रचना के प्रारंभिक प्रकाशन और 1882 में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इसके समावेश की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख है। मूल रचना के छह पदों को भी उनके साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शामिल किया गया है।

इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका है। पुस्तक में 1896 के कांग्रेस अधिवेशन, 1905 के बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान इस गीत के प्रभाव को समझने का प्रयास किया गया है। साथ ही औपनिवेशिक शासन के दौर में इस पर लगाए गए प्रतिबंधों और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच इसकी प्रेरणादायी उपस्थिति को भी स्थान दिया गया है।

पुस्तक में वर्ष 1937 का प्रसंग विशेष रूप से चर्चा में है। वंदे मातरम् के कुछ पदों को लेकर कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय, उससे जुड़े विवाद और उनकी अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याओं का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसके बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दिए जाने तक की यात्रा को भी शामिल किया गया है।

इस पुस्तक का एक समकालीन और महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के राज्यसभा भाषण पर केंद्रित है। वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिए गए उनके भाषण की उपलब्ध संपूर्ण प्रतिलिपि को एक स्वतंत्र अध्याय में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ भाषण के प्रमुख विचारों, ऐतिहासिक दावों और वैचारिक पक्षों का विषयवार विश्लेषण किया गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय पहचान, कांग्रेस की भूमिका, स्वदेशी आंदोलन और 2047 के विकसित भारत से जुड़े विचार भी अध्ययन का हिस्सा हैं।

पुस्तक की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें वक्ता के विचारों, ऐतिहासिक तथ्यों और संपादकीय विश्लेषण के बीच अंतर बनाए रखने का प्रयास किया गया है। लेखक का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रचार अथवा विरोध करना नहीं, बल्कि पाठकों के सामने ऐतिहासिक सामग्री और विभिन्न संदर्भ उपलब्ध कराना बताया गया है।

पाठ्य सामग्री और विषय-विस्तार के लिहाज से यह पुस्तक इतिहास के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, पत्रकारों, शिक्षकों और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इसमें प्रस्तुत ऐतिहासिक दावों और राजनीतिक व्याख्याओं को मूल अभिलेखों तथा स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोतों के साथ पढ़ना गंभीर अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा।

कुल मिलाकर, ‘वंदे मातरम्: 150 वर्षों की राष्ट्रचेतना’ एक गीत के बहाने भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय चेतना के विकास को समझने का प्रयास है। यह पुस्तक पाठकों को केवल अतीत की घटनाओं से परिचित नहीं कराती, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान संदर्भों पर विचार करने का अवसर भी देती है।

पुस्तक: वंदे मातरम्: 150 वर्षों की राष्ट्रचेतना  
संपादन एवं विश्लेषण: डॉ. धरवेश कठेरिया  
उपलब्धता: Amazon Kindle  
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