SAT-SAAW Weapon | 810 करोड़ का करार क्यों? भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने की तैयारी

Wed 23-Sep-2026,11:30 PM IST +05:30

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SAT-SAAW Weapon | 810 करोड़ का करार क्यों? भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने की तैयारी  SAT-SAAW Weapon
  • रक्षा मंत्रालय ने 160 SAT-SAAW के लिए 810.79 करोड़ रुपये का करार किया।

  • SAT-SAAW को DRDO ने स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया है।

  • 2027-28 और 2028-29 के बीच हथियारों की आपूर्ति निर्धारित की गई है।

Delhi / New Delhi :

New Delhi / भारतीय वायुसेना की ताकत को और बढ़ाने की दिशा में रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया है। लेकिन इस करार की खास बात सिर्फ इसकी कीमत नहीं, बल्कि वह स्वदेशी तकनीक है, जो आने वाले समय में दुश्मन के एयरफील्ड पर दूर से सटीक हमला करने की क्षमता को मजबूत कर सकती है।

810.79 करोड़ रुपये का करार
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के लिए 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वेपन यानी SAT-SAAW और उनसे जुड़े उपकरणों की खरीद के लिए भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के साथ करार किया है। यह समझौता 23 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुआ।

करार की कुल लागत 810.79 करोड़ रुपये है। इसे ‘बाय (इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड)’ श्रेणी के तहत किया गया है। इसका मतलब है कि इस हथियार प्रणाली के विकास और निर्माण में देश के भीतर तैयार तकनीक और संसाधनों पर जोर दिया गया है।

क्या है SAT-SAAW?
SAT-SAAW एक हवा से जमीन पर मार करने वाला सटीक निर्देशित ग्लाइड बम है। इसे विमान से लॉन्च करने के बाद यह अपने लक्ष्य की ओर निर्देशित होकर हमला करने में सक्षम है। इसकी प्रमुख विशेषता लंबी स्टैंड-ऑफ रेंज से दुश्मन के एयरफील्ड जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता है।

इस हथियार को भारतीय वायुसेना के जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। ऐसे में इसके शामिल होने से वायुसेना के पास दूर से सटीक हमला करने का एक और स्वदेशी विकल्प उपलब्ध होगा।

DRDO ने किया स्वदेशी विकास
SAT-SAAW को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने देश में ही डिजाइन और विकसित किया है। इस प्रणाली में करीब 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसके अलावा इसके साथ जुड़े कई महत्वपूर्ण उप-प्रणालियों को भी स्वदेशी बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इनमें इनिशियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर शामिल हैं।

इस कदम का सीधा संबंध रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने से है। स्वदेशी उप-प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल से आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू रक्षा उद्योग की क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

2027-28 से शुरू होगी आपूर्ति
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक SAT-SAAW की आपूर्ति 2027-28 और 2028-29 के बीच निर्धारित की गई है। भारतीय वायुसेना में इस प्रणाली के शामिल होने के बाद उसकी परिचालन क्षमताओं में और विस्तार होने की उम्मीद है।

लंबी दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता आधुनिक हवाई अभियानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में SAT-SAAW जैसी स्वदेशी प्रणाली वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में उपयोगी हो सकती है।

आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को बढ़ावा
यह करार केवल 160 हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है। इसमें स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग और घरेलू तकनीकी क्षमता को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, SAT-SAAW को वायुसेना में शामिल किए जाने से देश की रक्षा तैयारियों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही यह समझौता भारत के आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में जारी प्रयासों का एक और उदाहरण है।