हिंद-प्रशांत में बढ़ता समुद्री तनाव! राजनाथ सिंह ने दुनिया को क्या चेतावनी दी?
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Indo-Pacific Regional Dialogue 2026
राजनाथ सिंह ने हिंद-प्रशांत देशों से समुद्री सहयोग मजबूत करने की अपील की।
समुद्री सुरक्षा में AI, आधुनिक सेंसर और तकनीक की भूमिका पर जोर दिया गया।
भारत ने मुक्त, समावेशी और नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई।
New Delhi / दुनिया के समुद्री रास्तों पर बढ़ता तनाव, व्यापार में रुकावटें और साइबर हमलों का खतरा… क्या आने वाले समय में महासागर वैश्विक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं? इसी सवाल के बीच भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों से एकजुट होने की अपील की है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और सहयोग को लेकर भारत ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में आयोजित ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद 2026’ को संबोधित करते हुए कहा कि क्षेत्रीय देशों को आपसी निर्भरता को अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाने की दिशा में काम करना होगा। इसके लिए उन्होंने आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता, भरोसेमंद समुद्री बुनियादी ढांचे, बेहतर समुद्री जागरूकता और आपसी सहयोग को जरूरी बताया।
यह भारतीय नौसेना का वार्षिक उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक सम्मेलन है, जिसकी शुरुआत 3 नवंबर 2026 को हुई। रक्षा मंत्री ने कहा कि महासागर देशों और सभ्यताओं के बीच बाधा नहीं, बल्कि एक पुल की तरह हैं। इनके माध्यम से व्यापार, आजीविका, ज्ञान और संस्कृति का आदान-प्रदान होता है। लेकिन कुछ देश अपने संकीर्ण हितों के लिए समुद्री रास्तों और व्यापारिक निर्भरताओं का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे नौवहन की स्वतंत्रता और वैश्विक समुद्री सुरक्षा के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं।
राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यवधान के कारण वैश्वीकरण और समुद्री संपर्कों को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके बजाय देशों को ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी, जिससे वे किसी बाधा का पहले से अनुमान लगा सकें, उसका सामना कर सकें और उससे उबर सकें।
रक्षा मंत्री ने समुद्री सुरक्षा के बदलते स्वरूप पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि खतरे केवल सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना, साइबर हमले और प्राकृतिक आपदाएं भी बड़ी चुनौतियां हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वचालित प्रणालियां, नए सेंसर और डेटा विश्लेषण समुद्री निगरानी तथा सुरक्षा को बेहतर बना सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक तभी प्रभावी होगी, जब उसका इस्तेमाल वास्तविक समस्याओं को हल करने के लिए किया जाएगा।
उन्होंने आगाह किया कि तकनीकी प्रगति का लाभ केवल कुछ देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। छोटे समुद्री और विकासशील देशों को भी अनुसंधान, शिक्षा, नवाचार और क्षमता निर्माण में सहयोग मिलना जरूरी है।
भारत के समुद्री विकास का उल्लेख करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में समुद्री क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने सागरमाला, बंदरगाहों के विकास, तटीय आर्थिक गतिविधियों और ‘समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047’ का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने समुद्री पर्यावरण के संरक्षण और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर भी जोर दिया।
रक्षा मंत्री ने भारत की ‘महासागर’ यानी क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति की सोच तथा वर्ष 2019 में घोषित ‘हिंद-प्रशांत महासागर पहल’ को क्षेत्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण आधार बताया।
वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने कहा कि समुद्री सहयोग केवल उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि देशों को तकनीक के संचालन, रखरखाव और विकास की क्षमता भी हासिल करनी होगी। सम्मेलन में समुद्री विज्ञान, जलवायु अनुकूलन, वैज्ञानिक डेटा साझा करने और संयुक्त अनुसंधान पर भी चर्चा हुई।
इस कार्यक्रम में थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ, वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल आशुतोष दीक्षित और अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।
कुल मिलाकर, हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद 2026 का संदेश स्पष्ट है—समुद्री सुरक्षा किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा सहयोग, भरोसे और ठोस साझेदारियों से ही इस क्षेत्र का भविष्य सुरक्षित और समृद्ध बनाया जा सकता है।