पराली जलाने पर केंद्र सरकार सख्त! शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों को दिए कड़े निर्देश, क्या बदलेगी तस्वीर?
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केंद्र सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश दिए।
हरियाणा में घटनाएं 53.3% और उत्तर प्रदेश में लगभग 32% कम होने की जानकारी दी गई।
पराली से जैविक खाद, बायो-सीएनजी, बिजली और पशु चारा बनाने पर जोर दिया गया।
New Delhi / दिल्ली-एनसीआर की हवा को प्रदूषण से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने अब सख्त रुख अपना लिया है। पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए हाईलेवल बैठक हुई। सवाल है, क्या इस बार किसानों को राहत और प्रदूषण पर लगाम साथ-साथ लगेगी?
धान की कटाई के मौजूदा सीजन में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के कृषि भवन में एक उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक की सह-अध्यक्षता केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। इसमें पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित प्रमुख राज्यों के कृषि मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने स्पष्ट कहा कि धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच समय कम बचा है। इसलिए अधिकारियों को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर उतरकर तेजी से काम करना होगा। जिला कलेक्टरों को तत्काल बैठकें आयोजित करने, निगरानी मजबूत करने और व्यावहारिक समाधान लागू करने के निर्देश दिए गए।
पराली समस्या नहीं, किसानों की अतिरिक्त आय का साधन
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों से केवल पराली नहीं जलाने की अपील करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें आसान, सस्ते और सुलभ विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
उन्होंने बताया कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के लाभकारी जीवों तथा पोषक तत्वों को नुकसान पहुंचता है। इसके बजाय पराली को खेत में मिलाकर जैविक खाद बनाई जा सकती है। खेत से बाहर निकालकर इसका उपयोग बायो-सीएनजी, बायो-इथेनॉल, बिजली उत्पादन और पशु चारे के लिए भी किया जा सकता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी के अवसर मिल सकते हैं।
हरियाणा और यूपी में कमी, मध्य प्रदेश और राजस्थान पर चिंता
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर की अवधि में पिछले वर्ष की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत कम हुईं। पंजाब में भी कुछ गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में घटनाओं में वृद्धि को लेकर चिंता जताई गई। शिवराज सिंह चौहान ने इन राज्यों को प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान करके विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि कटाई का बड़ा हिस्सा अभी बाकी है, इसलिए किसी भी राज्य को निगरानी में ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए।
3.54 लाख से अधिक मशीनों का उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश
पराली प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार अब तक राज्यों को 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें उपलब्ध करा चुकी है। वित्त वर्ष 2026-27 में 26,109 नई मशीनें भी दी गई हैं।
कृषि मंत्री ने निर्देश दिया कि केवल नई मशीनें वितरित करना पर्याप्त नहीं है। पुरानी खराब मशीनों की तत्काल मरम्मत कराकर उन्हें भी उपयोग के योग्य बनाया जाए। कस्टम हायरिंग सेंटरों को सक्रिय करने पर भी जोर दिया गया, ताकि छोटे और सीमांत किसानों को सस्ती दरों पर मशीनें मिल सकें।
हजारों करोड़ रुपये की सहायता, उपयोगिता प्रमाणपत्र पर जोर
बैठक में बताया गया कि 2018-19 से 2025-26 के दौरान फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें पंजाब को 2,056.50 करोड़, हरियाणा को 1,171.71 करोड़, उत्तर प्रदेश को 868.67 करोड़ और मध्य प्रदेश को 59 करोड़ रुपये मिले।
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 592.57 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिनमें से 430.87 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। राशि के उपयोग की धीमी गति पर चिंता जताते हुए पंजाब सरकार से पूर्व में जारी धन के उपयोगिता प्रमाणपत्र जल्द भेजने का आग्रह किया गया, ताकि अगली किस्त जारी करने में देरी न हो।
सैटेलाइट निगरानी के साथ जमीन पर भी होगी कार्रवाई
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला और गुरदासपुर तथा हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला और फतेहाबाद जैसे जिलों में विशेष निगरानी पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए उपग्रह आंकड़ों के साथ जमीनी निरीक्षण भी जरूरी है। विशेष रूप से दोपहर तीन बजे के बाद उपग्रह निगरानी में आने वाले अंतराल के दौरान ग्राउंड पेट्रोलिंग और फ्लाइंग स्क्वॉड के जरिए सख्त निगरानी करने के निर्देश दिए गए।
इसके साथ ही वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ आंकड़ों का बेहतर समन्वय करने तथा मौसम और फसल कटाई के समय का आकलन करने पर भी जोर दिया गया।
किसानों को विकल्प देना ही स्थायी समाधान
केंद्र सरकार का लक्ष्य केवल पराली जलाने की घटनाओं को रोकना नहीं, बल्कि ऐसा तंत्र विकसित करना है जिसमें किसानों को फसल अवशेष जलाने की जरूरत न पड़े। इसके लिए पराली से ऊर्जा उत्पादन, उद्योगों तक सीधी आपूर्ति और कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
अब सबसे बड़ी चुनौती इन निर्देशों को खेतों तक पहुंचाने की है। यदि मशीनें समय पर उपलब्ध होती हैं, पराली के उपयोग के लिए बाजार तैयार होता है और निगरानी प्रभावी रहती है, तो किसानों को आर्थिक लाभ देने के साथ प्रदूषण कम करने में भी मदद मिल सकती है।