इराक ने भारत को सस्ता तेल ऑफर किया, लेकिन होर्मुज मार्ग की शर्त से बढ़ा जोखिम
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इराक ने भारत को सस्ता कच्चा तेल ऑफर किया, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने की शर्त ने सुरक्षा जोखिम बढ़ा दिया है।
ईरान-अमेरिका तनाव के चलते तेल सप्लाई बाधित, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
भारत के लिए सस्ता तेल एक अवसर है, लेकिन रणनीतिक और सुरक्षा जोखिम को देखते हुए फैसला लेना चुनौतीपूर्ण बन गया है।
Iraq/ मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच इराक ने भारत समेत अपने प्रमुख ग्राहकों को सस्ते कच्चे तेल का आकर्षक ऑफर दिया है। हालांकि इस ऑफर के साथ जुड़ी एक अहम शर्त ने इसे जटिल बना दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के कारण तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। हालिया तनाव, विशेष रूप से ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने इस मार्ग को असुरक्षित बना दिया है।
इसी कारण इराक को अपने तेल निर्यात में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। निर्यात बनाए रखने के लिए इराक ने अपने टर्म कॉन्ट्रैक्ट ग्राहकों के लिए कीमतों में कटौती की है, जिससे भारत जैसे बड़े आयातकों को सस्ता तेल उपलब्ध हो सके।
लेकिन इस ऑफर की सबसे बड़ी चुनौती इसकी शर्त है। इराक ने साफ किया है कि तेल की लोडिंग फारस की खाड़ी के उन टर्मिनलों से होगी, जहां तक पहुंचने के लिए जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरना होगा। वर्तमान हालात में यह मार्ग जहाजों, चालक दल और कार्गो के लिए जोखिमभरा माना जा रहा है।
भारत, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है, लंबे समय से इराक का प्रमुख ग्राहक रहा है। 2022 में भारत के कुल तेल आयात में इराक की हिस्सेदारी लगभग 26 प्रतिशत थी। 2024 में भारत ने इराक से करीब 28-29 अरब डॉलर का तेल खरीदा था। हालांकि, 2026 में तनाव बढ़ने के बाद इराक से आयात में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
रूस पर लगे प्रतिबंधों के बाद भारत पहले ही वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में है। ऐसे में इराक का यह सस्ता ऑफर आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन सुरक्षा जोखिम इसे चुनौतीपूर्ण बना देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस मामले में बेहद संतुलित निर्णय लेना होगा, ताकि आर्थिक लाभ और सामरिक सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखा जा सके। आने वाले दिनों में भारत का रुख वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकता है।