डायबिटीज रिवर्सल: दवाओं से आगे सोचने की ज़रूरत
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Diabetes Reversal
इंसुलिन रेजिस्टेंस समझे बिना डायबिटीज रिवर्सल संभव नहीं.
कम कार्ब और सही भोजन से ब्लड शुगर स्वाभाविक रूप से घटती है.
ज्ञान, अनुशासन और जीवनशैली बदलाव से संभव है बेहतर स्वास्थ्य.
Nagpur / अक्सर लोगों के मन में यह धारणा बैठी होती है कि डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसे जीवन भर केवल कंट्रोल ही किया जा सकता है। दवाइयाँ, परहेज़ और नियमित जांच—यही इसका रास्ता माना जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ दशकों में इंसुलिन रेजिस्टेंस पर हुई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस सोच को चुनौती दी है। आज बड़ी संख्या में विशेषज्ञ मानते हैं कि सही समझ, सही भोजन और अनुशासित जीवनशैली के जरिए टाइप-2 डायबिटीज को सिर्फ कंट्रोल ही नहीं, बल्कि रिवर्स भी किया जा सकता है।
डायबिटीज को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि भोजन शरीर में कैसे काम करता है। हमारे खाने में मुख्य रूप से तीन पोषक तत्व होते हैं—प्रोटीन, फैट और कार्बोहाइड्रेट। इनमें से कार्बोहाइड्रेट शरीर में जाकर ग्लूकोज़ यानी शुगर में बदल जाते हैं। यही शुगर खून में घूमती है और शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचकर ऊर्जा बनती है। लेकिन शुगर अपने आप कोशिकाओं में नहीं जा सकती, इसके लिए इंसुलिन नामक हार्मोन की जरूरत होती है।
समस्या तब पैदा होती है जब हमारा भोजन लगातार कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है। ज्यादा रोटी, चावल, मीठा और प्रोसेस्ड फूड खाने से खून में शुगर तेजी से बढ़ती है। शरीर इस बढ़ी हुई शुगर को संभालने के लिए ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। शुरुआत में यह सिस्टम काम करता है, लेकिन समय के साथ कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति असंवेदनशील होने लगती हैं। यानी इंसुलिन मौजूद होता है, फिर भी शुगर कोशिकाओं के अंदर नहीं जा पाती। इसी स्थिति को इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है और यहीं से टाइप-2 डायबिटीज की नींव पड़ती है।
जब जांच में ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आता है, तो आमतौर पर इलाज की शुरुआत दवाओं से होती है। ये दवाइयाँ या तो शरीर को ज्यादा इंसुलिन बनाने के लिए प्रेरित करती हैं या शुगर को जबरन कोशिकाओं के अंदर धकेलती हैं। इससे रिपोर्ट कुछ समय के लिए ठीक दिखने लगती है, लेकिन असली समस्या—इंसुलिन रेजिस्टेंस—ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसका नतीजा यह होता है कि शरीर में फैट जमा होने लगता है, वजन बढ़ता है और धीरे-धीरे हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, फैटी लिवर और दिल से जुड़ी बीमारियाँ भी सामने आने लगती हैं।
अगर जड़ में जाकर देखें, तो सवाल सीधा है—जब ब्लड शुगर बढ़ने की मुख्य वजह ज्यादा कार्बोहाइड्रेट है, तो समाधान भी वहीं से शुरू होना चाहिए। यानी कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करना। जब खाने में कार्बोहाइड्रेट घटते हैं, तो ब्लड शुगर अपने आप नीचे आने लगती है। शुगर कम होगी तो इंसुलिन की जरूरत भी कम पड़ेगी। जैसे-जैसे इंसुलिन का स्तर घटता है, वैसे-वैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस भी कम होने लगती है। यही प्रक्रिया डायबिटीज रिवर्सल की बुनियाद है।
यह समझना भी जरूरी है कि सभी कार्बोहाइड्रेट एक जैसे नहीं होते। कार्बोहाइड्रेट मूल रूप से शुगर के अणुओं से बने होते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट बहुत तेजी से पचकर ब्लड शुगर बढ़ाते हैं, जबकि कुछ का असर बेहद कम होता है। इसी आधार पर कार्बोहाइड्रेट को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। सरल शुगर जैसे ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ तुरंत ब्लड शुगर बढ़ाते हैं। स्टार्च जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट भी पाचन के बाद शुगर में बदल जाते हैं और तेजी से असर दिखाते हैं। वहीं फाइबर जैसे कार्बोहाइड्रेट या तो बहुत धीरे असर करते हैं या बिल्कुल नहीं करते।
यहीं से ग्लाइसेमिक और नॉन-ग्लाइसेमिक कार्बोहाइड्रेट का विचार सामने आता है। जो कार्बोहाइड्रेट ब्लड शुगर बढ़ाते हैं, वे ग्लाइसेमिक कहलाते हैं, और जो नहीं बढ़ाते, वे नॉन-ग्लाइसेमिक। किसी भी भोजन का डायबिटीज पर असर समझने के लिए नेट कार्बोहाइड्रेट देखा जाता है, यानी कुल कार्बोहाइड्रेट में से फाइबर घटाने के बाद जो बचता है। जिस भोजन में नेट कार्ब कम होगा, वह डायबिटीज के लिए उतना ही सुरक्षित माना जाएगा।
प्रोटीन और फैट ब्लड शुगर को सीधे नहीं बढ़ाते। घी, तेल, मक्खन, नट्स और सीड्स सीमित मात्रा में लिए जाएँ तो शुगर पर इनका असर नहीं पड़ता। अधिकांश हरी सब्जियाँ सुरक्षित होती हैं। फल भी लिए जा सकते हैं, लेकिन सीमित मात्रा में और समझदारी के साथ। सबसे ज्यादा सावधानी अनाज, दालें और मीठे खाद्य पदार्थों में जरूरी होती है, क्योंकि इनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है।
डायबिटीज रिवर्सल का रास्ता किसी चमत्कार से नहीं गुजरता, बल्कि ज्ञान और अनुशासन से बनता है। ज्ञान यानी यह समझ कि कौन सा भोजन शरीर में क्या असर करता है। अनुशासन यानी इस समझ को रोजमर्रा की जिंदगी में लागू करना। इसके लिए डाइट को इतना लचीला बनाना जरूरी है कि वह लंबे समय तक निभाई जा सके।
डायबिटीज रिवर्सल के कुछ बुनियादी सिद्धांत सरल हैं—दिन भर में कुल ग्लाइसेमिक लोड कम रखना, खाने और न खाने का एक निश्चित समय तय करना, भोजन में फाइबर और सब्जियों की मात्रा बढ़ाना, पर्याप्त पानी पीना और शारीरिक गतिविधि को जीवन का हिस्सा बनाना।
अंततः यही कहा जा सकता है कि डायबिटीज कोई अचानक ठीक होने वाली समस्या नहीं है, लेकिन यह स्थायी भी नहीं है। जब हम बीमारी को दबाने के बजाय उसकी जड़ को समझकर उस पर काम करते हैं, तो शरीर खुद को ठीक करने की क्षमता दिखाता है। सही भोजन, सही जानकारी और निरंतर अनुशासन के साथ डायबिटीज रिवर्सल न केवल संभव है, बल्कि बेहतर और स्वस्थ जीवन की ओर एक मजबूत कदम भी है।