ईरान-अमेरिका जंग का वैश्विक असर: तेल की कीमतें बढ़ीं, भारत-चीन के लिए होर्मुज बना बड़ी चिंता

Sat 07-Mar-2026,10:08 PM IST +05:30

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ईरान-अमेरिका जंग का वैश्विक असर: तेल की कीमतें बढ़ीं, भारत-चीन के लिए होर्मुज बना बड़ी चिंता Iran UD War Impact
  • ईरान-अमेरिका संघर्ष से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल.

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव से भारत-चीन की चिंता बढ़ी.

  • वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट, आर्थिक संकट की आशंका.

American Samoa / :

America / अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष को अब एक हफ्ते से अधिक समय हो चुका है। यह टकराव 28 फरवरी को शुरू हुआ था और तब से हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। दोनों पक्षों के रुख से यह साफ दिखाई दे रहा है कि फिलहाल कोई भी पीछे हटने के मूड में नहीं है। इस सैन्य टकराव का असर अब धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है, खासकर ऊर्जा बाजार और शेयर बाजारों पर।

इस युद्ध का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। पिछले एक हफ्ते में क्रूड ऑयल की कीमतों में लगभग 19 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है और यह 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं। कुछ विश्लेषकों ने यह भी चेतावनी दी है कि हालात बिगड़ने पर कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

इस पूरे संकट की सबसे संवेदनशील कड़ी होर्मुज की खाड़ी मानी जा रही है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। खासतौर पर भारत और चीन जैसे देशों के लिए यह मार्ग बहुत अहम है, क्योंकि ये देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं।

हाल के दिनों में ऐसी खबरें भी सामने आई हैं कि ईरान ने इस समुद्री मार्ग को आंशिक रूप से बाधित कर दिया है या उस पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है। अगर यह रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है तो भारत और चीन जैसे देशों के लिए यह बड़ी चिंता की बात होगी। हालांकि दोनों देश वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों की तलाश में जुटे हुए हैं, लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत को तुरंत पूरा करना आसान नहीं होगा।

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अगर तेल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ती हैं या सप्लाई में बाधा आती है तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक पर पड़ेगा।

उद्योगों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक गुजरात के सूरत और मोरबी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में कुछ टाइल्स फैक्ट्रियों ने उत्पादन कम करने या अस्थायी रूप से बंद करने का फैसला किया है। अगर ऊर्जा की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो अन्य उद्योगों पर भी इसका असर पड़ सकता है। परिवहन, मैन्युफैक्चरिंग और समुद्री व्यापार जैसी गतिविधियों में भी रुकावट आ सकती है।

इस संघर्ष का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। दक्षिण कोरिया का प्रमुख शेयर सूचकांक कोस्पी (Kospi) एक हफ्ते में करीब 10 प्रतिशत तक गिर चुका है और एक दिन में तो यह लगभग 13 प्रतिशत तक टूट गया था। जापान का निक्केई इंडेक्स करीब 4 प्रतिशत गिरा है, जबकि भारत का निफ्टी लगभग 3 प्रतिशत नीचे आया है। अमेरिका का एसएंडपी 500 भी करीब 1.24 प्रतिशत गिरा है।

दिलचस्प बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजार, जिन पर अपेक्षाकृत कम असर की उम्मीद की जा रही थी, वहां भी शेयर बाजार में करीब 3.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। चीन का शंघाई कंपोजिट इंडेक्स अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, जिसमें करीब 0.66 प्रतिशत की गिरावट आई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाजारों में आई गिरावट यह संकेत देती है कि निवेशकों को उम्मीद है कि यह संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। हालांकि जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बता रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि यह संघर्ष रूस-यूक्रेन या हमास-इजरायल युद्ध से अलग है। उन संघर्षों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीमित असर पड़ा था, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

अगर तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतें बेकाबू हो जाती हैं तो कई देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट आ सकता है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि क्या आने वाले दिनों में यह संघर्ष शांत होगा या फिर यह वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।