सोशल मीडिया का ‘फ्लेक्स ट्रेंड’ और स्त्रीत्व की बहस: सौंदर्य, स्वतंत्रता और सम्मान के बीच समाज
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Social Media Flex Trend
सोशल मीडिया के फ्लेक्स ट्रेंड से स्त्रीत्व पर नई बहस.
सौंदर्य, स्वतंत्रता और गरिमा के बीच संतुलन की जरूरत.
किशोरियों के आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव.
Nagpur / आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह ट्रेंड, विचार और बहस गढ़ने का सबसे तेज मंच बन चुका है। हाल के वर्षों में एक नया चलन चर्चा में है, जिसे युवा भाषा में ‘फ्लेक्स करना’ कहा जा रहा है। खासकर स्त्रियों द्वारा अपने शरीर, विशेष रूप से स्तनों को दिखाने को आत्मविश्वास, बोल्डनेस और आधुनिकता से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। यह ट्रेंड जहां एक ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर समाज में स्त्रीत्व, गरिमा और सम्मान को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है।
प्रकृति ने स्त्री को अद्भुत सृजनात्मक शक्ति से नवाजा है। स्त्री का अस्तित्व केवल उसके शारीरिक रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता, ममता, धैर्य और अद्भुत सहनशक्ति का समावेश होता है। स्तनों का महत्व भी केवल सौंदर्य या आकर्षण तक सीमित नहीं है। वे मातृत्व, पोषण और जीवन के आरंभ का प्रतीक हैं। जब कोई स्त्री माँ बनती है, तो यह केवल जैविक परिवर्तन नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी सृजनात्मक ऊर्जा की पूर्णता का क्षण होता है।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने शरीर को ‘कंटेंट’ में बदल दिया है। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स की होड़ में कई बार यह भूल हो जाती है कि स्त्री का शरीर केवल प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा से जुड़ा विषय है। विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या स्त्रियों की स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि उस नजरिए में है जो स्त्री को केवल उसके अंगों तक सीमित कर देता है।
इतिहास, कला और साहित्य में स्त्री सौंदर्य का वर्णन हमेशा से रहा है। मूर्तिकला से लेकर कविता तक, स्त्री के रूप को सृजन और करुणा के प्रतीक के रूप में देखा गया। लेकिन इन अभिव्यक्तियों का उद्देश्य कभी भी स्त्री को वस्तु में बदलना नहीं था। इसके विपरीत, वे स्त्री के भीतर की कोमलता और शक्ति का उत्सव थीं। आज की चुनौती यही है कि आधुनिक अभिव्यक्ति और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हर स्त्री को यह तय करने का अधिकार है कि वह क्या पहने और कैसे खुद को प्रस्तुत करे। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि समाज स्त्री को केवल बाहरी छवि से न आंकें। मातृत्व को महिमामंडित करते हुए भी यह समझना आवश्यक है कि हर स्त्री का जीवन लक्ष्य माँ बनना ही नहीं होता। मातृत्व एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं। स्त्रीत्व का सम्मान उसके निर्णयों, सपनों और क्षमताओं में निहित है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार शरीर आधारित ट्रेंड्स का असर किशोरियों और युवा महिलाओं के आत्मसम्मान पर भी पड़ता है। तुलना की संस्कृति उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि उनकी पहचान उनके शरीर से तय होती है। यह सोच दीर्घकाल में मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है।
आज जरूरत इस बात की है कि समाज स्त्री को एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखे। उसकी पहचान केवल ‘फ्लेक्स’ या ट्रेंड तक सीमित न हो, बल्कि उसकी शिक्षा, सोच, संवेदना और योगदान को समान महत्व मिले। सोशल मीडिया पर आज़ादी के साथ-साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। स्त्री का सम्मान केवल उसके शरीर में नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं, विचारों और क्षमताओं में बसता है। यही दृष्टि एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज की नींव रख सकती है।