डाइवर्टिकुलोसिस: उम्र के साथ आंतों में होने वाला सामान्य बदलाव या आने वाली बीमारी की चेतावनी?
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Digestive Health India
डाइवर्टिकुलोसिस उम्र से जुड़ा सामान्य बदलाव, हमेशा बीमारी नहीं.
कम फाइबर और निष्क्रिय जीवनशैली से जोखिम बढ़ता है.
सही आहार और दिनचर्या से जटिलताओं की रोकथाम संभव.
Nagpur / उम्र बढ़ना केवल बाहरी बदलावों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के भीतर भी कई ऐसे परिवर्तन लाता है, जिन्हें अक्सर हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। पाचन तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। बड़ी आंत से जुड़ी एक ऐसी ही स्थिति है डाइवर्टिकुलोसिस, जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान उम्र-संबंधी शारीरिक बदलाव के रूप में देखता है। जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती है, बड़ी आंत की दीवारों की लचक और मजबूती धीरे-धीरे कम होने लगती है। इसी दौरान आंत के भीतर बनने वाला दबाव कुछ कमजोर हिस्सों को बाहर की ओर उभार देता है, जिससे छोटी-छोटी थैलियाँ बन जाती हैं, जिन्हें डाइवर्टिकुला कहा जाता है। शोध बताते हैं कि 60 वर्ष की उम्र के बाद यह स्थिति तेजी से बढ़ती है और 80 वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश लोगों में किसी न किसी स्तर पर यह बदलाव देखा जा सकता है। हालांकि नाम सुनकर यह किसी गंभीर बीमारी जैसा लगता है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि डाइवर्टिकुलोसिस अपने आप में बीमारी नहीं है, बल्कि उम्र के साथ होने वाला एक सामान्य शारीरिक परिवर्तन है, ठीक वैसे ही जैसे हड्डियों का घनत्व कम होना या मेटाबॉलिज़्म का धीमा पड़ जाना।
इस स्थिति के पीछे केवल उम्र ही जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि आधुनिक जीवनशैली भी इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है। कम फाइबर वाला भोजन, अत्यधिक प्रोसेस्ड और रिफाइंड खाद्य पदार्थ, पानी की कमी और शारीरिक गतिविधि का अभाव आंतों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डालते हैं। जब आहार में फाइबर की मात्रा कम होती है, तो मल सख्त हो जाता है और आंतों को उसे आगे बढ़ाने के लिए ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता है। यही अतिरिक्त दबाव आंत की कमजोर दीवारों पर पड़ता है और समय के साथ डाइवर्टिकुला बनने लगते हैं। खास बात यह है कि डाइवर्टिकुलोसिस के अधिकतर मामलों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है और उसे यह पता भी नहीं चलता कि उसकी बड़ी आंत में ये संरचनात्मक बदलाव हो चुके हैं। कई बार यह स्थिति किसी अन्य जांच—जैसे कोलोनोस्कोपी या सीटी स्कैन—के दौरान संयोगवश सामने आती है। इसी कारण इसे चिकित्सा जगत में “साइलेंट कंडीशन” कहा जाता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब इन थैलियों में सूजन या संक्रमण हो जाता है। यह अवस्था डाइवर्टिकुलाइटिस कहलाती है, जिसमें पेट के निचले हिस्से में तेज़ दर्द, बुखार, मतली, उल्टी, कब्ज या दस्त और कभी-कभी आंतों से खून आने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में यह संक्रमण आंत की दीवार में छेद, फोड़ा या पूरे शरीर में संक्रमण फैलने जैसी जटिल और जानलेवा स्थितियाँ भी पैदा कर सकता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि डाइवर्टिकुलोसिस से जुड़ी जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है, बशर्ते समय रहते जीवनशैली और खानपान पर ध्यान दिया जाए। फाइबर युक्त संतुलित आहार को इसका सबसे प्रभावी बचाव माना जाता है। साबुत अनाज, फल, हरी सब्ज़ियाँ, दालें और बीज न केवल पाचन को बेहतर बनाते हैं, बल्कि मल को नरम रखकर आंतों के अंदर दबाव को भी कम करते हैं। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि पानी की कमी होने पर फाइबर भी अपना पूरा लाभ नहीं दे पाता। नियमित शारीरिक गतिविधि—जैसे टहलना, योग, साइकिल चलाना या हल्का व्यायाम—आंतों की गति को सक्रिय रखती है और कब्ज की समस्या से बचाव करती है। पहले यह धारणा प्रचलित थी कि डाइवर्टिकुलोसिस वाले लोगों को बीज, मेवे और मक्का जैसी चीज़ों से परहेज़ करना चाहिए, लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोधों ने इस सोच को गलत साबित किया है। अब विशेषज्ञ मानते हैं कि ये खाद्य पदार्थ सही मात्रा में सुरक्षित हैं और कई मामलों में लाभकारी भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर, विज्ञान का संदेश साफ़ है—डाइवर्टिकुलोसिस डरने की नहीं, समझने की स्थिति है। यह उम्र के साथ होने वाला एक सामान्य बदलाव है, जिसे स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर और जागरूक रहकर गंभीर बीमारी में बदलने से रोका जा सकता है। आंतों की सेहत का ध्यान रखना न केवल बेहतर पाचन, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय बुढ़ापे की कुंजी भी है।