उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने बेलगावी के वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम समारोह का किया उद्घाटन
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Yaduru Temple Ceremony
उपराष्ट्रपति ने वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम समारोह का उद्घाटन किया.
भारत की आध्यात्मिक परंपरा और सनातन धर्म पर दिया संदेश.
कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग और श्रद्धालु शामिल हुए.
Karnataka / उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने गुरुवार को कर्नाटक के बेलगावी जिले के यदुर स्थित श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में आयोजित राजगोपुरम, कलशारोहण और महाकुंभाभिषेकम समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और धर्मगुरु मौजूद रहे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने इसे केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना और सभ्यतागत गौरव के पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।
भारत को बताया जीवंत सभ्यता
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं बल्कि एक जीवंत और निरंतर प्रवाहित होने वाली सभ्यता है। उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना एक अखंड धारा की तरह बहती रही है। यह वही पवित्र भूमि है जहां वेदों का शाश्वत ज्ञान पहली बार सुना गया और जहां श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश आज भी मानवता को कर्म, धर्म और समर्पण का मार्ग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि हिंदू चेतना केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है। “वसुधैव कुटुम्बकम” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देती है और प्रकृति सहित हर जीव में दिव्यता का दर्शन करना सिखाती है।
वीर-शैव लिंगायत परंपरा का योगदान
उपराष्ट्रपति ने वीर-शैव लिंगायत परंपरा के योगदान की भी विशेष रूप से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस परंपरा ने कर्नाटक और पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वीर-शैव मठों और मंदिरों ने समाज में श्रद्धा, सेवा और सामाजिक समरसता के मूल्यों को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
उन्होंने शिव योगी श्री कदासिद्धेश्वर स्वामीजी की आध्यात्मिक दृष्टि की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने समय के साथ ओझल हो चुके इस पवित्र स्थल को फिर से खोजा और उसका पुनरुद्धार किया। इससे सनातन धर्म की शाश्वत ज्योति को फिर से प्रज्वलित करने का अवसर मिला।
सनातन धर्म की अमर परंपरा
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सनातन धर्म को समय-समय पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन इसकी मूल भावना कभी समाप्त नहीं हो सकती। उन्होंने विश्वास जताया कि सनातन परंपरा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि समय इसकी परीक्षा तो ले सकता है, लेकिन इसे मिटा नहीं सकता।
उन्होंने श्री कदासिद्धेश्वर मठ के उत्तराधिकारी पीठाधीश्वरों के प्रयासों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि दैनिक पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर के जीर्णोद्धार कार्यों को निरंतर बनाए रखना समाज के आध्यात्मिक जीवन को सशक्त करता है।
“विकास भी, विरासत भी” का संदेश
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “विकास भी, विरासत भी” के दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत तकनीकी रूप से उन्नत, आर्थिक रूप से सशक्त और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि मंदिरों और पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार केवल स्थापत्य या वास्तुकला का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित करने का माध्यम है।
कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद
इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, राज्य सरकार के भारी और मध्यम उद्योग मंत्री एम. बी. पाटिल, श्री श्रीशैल जगद्गुरु डॉ. चन्ना सिद्धराम पंडिताराध्य शिवाचार्य स्वामीजी, राज्यसभा सांसद ईरन्ना कडाडी सहित कई धार्मिक और सामाजिक नेता उपस्थित रहे। समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भी भाग लिया और मंदिर परिसर में भक्ति और आस्था का विशेष वातावरण देखने को मिला।