चंद्र ग्रहण के कारण बदली होलिका दहन तिथि
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होलिका दहन में किन वस्तुओं को अग्नि में नहीं डालना चाहिए, जानें धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से पूरी जानकारी।
फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन का महत्व, शुभ अर्पण सामग्री और पौराणिक कथा से जुड़ी विशेष जानकारी।
Nagpur/ रंगों का पर्व होली इस वर्ष 4 मार्च 2026 को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। हालांकि इस बार होलिका दहन की तिथि में बदलाव किया गया है। आमतौर पर होली से एक दिन पहले होलिका दहन होता है, लेकिन 3 मार्च को लगने वाले वर्ष के पहले चंद्र ग्रहण के कारण इसे 2 मार्च 2026 को संपन्न किया जाएगा। ग्रहण भारत में दृश्य होगा, इसलिए सूतक काल मान्य रहेगा और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए तिथि परिवर्तित की गई है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि नकारात्मक शक्तियों के दहन और सकारात्मक ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में अग्नि प्रज्वलित कर भक्तजन आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन अग्नि में विशेष वस्तुएं अर्पित करने का महत्व बताया गया है, वहीं कुछ वस्तुओं को डालना वर्जित माना गया है।
ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार होलिका दहन की पवित्र अग्नि में पानी वाला नारियल, सूखे या मुरझाए फूल, टूटे चावल, खराब फल, तुलसी पत्र तथा पीपल, बरगद, आम और शमी जैसे पूजनीय वृक्षों की लकड़ी नहीं डालनी चाहिए। इसके अतिरिक्त चमड़े या प्लास्टिक की वस्तुएं, कांच, टूटी चीजें, पुरानी झाड़ू, गंदे कपड़े या चोरी का सामान अर्पित करना अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
वहीं शुभ फल प्राप्ति के लिए घी, गोबर के उपले, सूखा नारियल, लौंग, गेहूं की नई बालियां, चने की फली, जौ, अक्षत, गुलाल, बताशे, काले तिल, पीली सरसों, कपूर, मौसमी फल, हल्दी की गांठ, गंगाजल, रोली और कच्चा सूत अर्पित करना मंगलकारी माना गया है।
पौराणिक कथा के अनुसार होलिका दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन थी। उसने भक्त प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठने का प्रयास किया, लेकिन ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दहन हो गई। तभी से फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन की परंपरा प्रचलित है। इस प्रकार होलिका दहन आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है, जो समाज में प्रेम, एकता और सकारात्मकता का संदेश देता है।