बाइपोलर डिसऑर्डर: मन के दो ध्रुवों के बीच फंसा जीवन
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Bipolar Disorder
मैनिक और डिप्रेसिव अवस्थाओं के बीच गंभीर मानसिक संघर्ष.
सामाजिक कलंक और गलतफहमियां बीमारी को बढ़ाती हैं.
सही इलाज और सहयोग से संतुलित जीवन संभव.
Nagpur / बाइपोलर डिसऑर्डर, जिसे मैनिक–डिप्रेसिव डिसऑर्डर भी कहा जाता है, एक गंभीर और जटिल मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति का मन लगातार दो विपरीत अवस्थाओं के बीच झूलता रहता है। एक ओर अत्यधिक उत्साह, ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरी मैनिक अवस्था होती है, तो दूसरी ओर गहरे अवसाद, निराशा और आत्महीनता से भरी डिप्रेसिव अवस्था। यह बीमारी सामान्य मूड स्विंग्स से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें भावनात्मक बदलाव अचानक, तीव्र और लंबे समय तक बने रहते हैं। मैनिक अवस्था में व्यक्ति खुद को असाधारण रूप से शक्तिशाली, बुद्धिमान और सक्षम मानने लगता है, उसे नींद की जरूरत कम लगती है, विचार बहुत तेज़ी से दौड़ते हैं और वह बिना सोचे-समझे फैसले ले बैठता है, जैसे अत्यधिक खर्च करना, जोखिम भरे काम करना या अव्यावहारिक योजनाएं बनाना। कई बार यही अवस्था समाज में व्यक्ति को प्रतिभाशाली, मेहनती या अत्यधिक महत्वाकांक्षी दिखा देती है, जिससे बीमारी की पहचान और कठिन हो जाती है। इसके ठीक उलट, डिप्रेसिव अवस्था में वही व्यक्ति खुद को पूरी तरह खाली, असहाय और निरर्थक महसूस करने लगता है। उसे किसी भी काम में रुचि नहीं रहती, लगातार थकान, अपराधबोध और निराशा घेर लेती है, और कई मामलों में आत्महत्या जैसे विचार भी जन्म ले लेते हैं। भारत जैसे समाज में, जहां मानसिक रोगों को आज भी कमजोरी या सामाजिक कलंक से जोड़कर देखा जाता है, बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति अक्सर अपनी ही पीड़ा के साथ अकेला रह जाता है। परिवार और समाज कई बार उसके व्यवहार को जिद, आलस्य, घमंड या चरित्र दोष मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता यह होती है कि वह एक चिकित्सीय समस्या से जूझ रहा होता है। यही गलतफहमी इस बीमारी को और गहरा बना देती है।
बाइपोलर डिसऑर्डर के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन चिकित्सा शोध यह संकेत देते हैं कि इसके पीछे आनुवंशिक, जैविक और मनो-सामाजिक कारकों की संयुक्त भूमिका होती है। मस्तिष्क में रासायनिक संतुलन का बिगड़ना, विशेषकर डोपामिन और सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन, इस बीमारी के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि परिवार में पहले से किसी को मानसिक बीमारी रही हो, तो अगली पीढ़ी में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, बचपन के मानसिक आघात, लगातार तनाव, पारिवारिक कलह, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक दबाव और नशे की आदतें इस रोग को उभारने या गंभीर बनाने में भूमिका निभाती हैं। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसका देर से पहचान में आना है, क्योंकि मैनिक अवस्था को अक्सर सकारात्मक गुण समझ लिया जाता है और डिप्रेसिव अवस्था को सामान्य उदासी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी व्यक्ति के रिश्तों, करियर और सामाजिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। हालांकि यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन सही समय पर निदान, नियमित दवाइयों, मनोचिकित्सा, काउंसलिंग और पारिवारिक सहयोग से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मरीज यदि नियमित नींद ले, तनाव से निपटने के तरीके सीखे, नशे से दूर रहे और अपने इलाज को लेकर सजग रहे, तो वह एक संतुलित और सम्मानजनक जीवन जी सकता है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समाज की है, जिसे मानसिक रोगों के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। बाइपोलर डिसऑर्डर किसी की कमजोरी या पागलपन का प्रतीक नहीं, बल्कि एक चिकित्सीय स्थिति है, जिसका इलाज और प्रबंधन संभव है। जब तक हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर महत्व नहीं देंगे, तब तक ऐसे मरीज अपने मन के दो ध्रुवों के बीच फंसे रहेंगे। जागरूकता, सहानुभूति और वैज्ञानिक समझ ही वह रास्ता है, जिससे बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति अपने जीवन में स्थिरता और अर्थ पा सकता है।