एरोसोल से कहीं अधिक प्रभावी है जल वाष्प, जलवायु व मानसून पर गहरा असर

Fri 09-Jan-2026,12:23 AM IST +05:30

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एरोसोल से कहीं अधिक प्रभावी है जल वाष्प, जलवायु व मानसून पर गहरा असर
  • अध्ययन में स्पष्ट हुआ कि इंडो-गंगा मैदान में वायुमंडलीय तापन पर जल वाष्प का प्रभाव एरोसोल से अधिक शक्तिशाली है।

  • एरोसोल और जल वाष्प की परस्पर क्रिया मानसून, क्षेत्रीय जलवायु और विकिरण संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित करती है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि सटीक जलवायु पूर्वानुमान के लिए दोनों कारकों को जलवायु मॉडलों में शामिल करना आवश्यक है।

Delhi / New Delhi :

दिल्ली/ भारत और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा है। इंडो-गंगा मैदान पर केंद्रित इस शोध से स्पष्ट हुआ है कि वायुमंडलीय तापन और जलवायु प्रक्रियाओं को प्रभावित करने में जल वाष्प की भूमिका एरोसोल की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह निष्कर्ष जलवायु परिवर्तन को समझने, मानसून व्यवहार के आकलन और भविष्य के अधिक सटीक जलवायु पूर्वानुमान तैयार करने की दिशा में अत्यंत अहम माना जा रहा है।

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अधीन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES), नैनीताल और भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु द्वारा किए गए इस शोध में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी शामिल रहा। ग्रीस के पश्चिमी मैसेडोनिया विश्वविद्यालय और जापान के सोका विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मिलकर इंडो-गंगा मैदान (IGP) में एरोसोल लोडिंग और जल वाष्प विकिरण प्रभाव (WVRE) के आपसी संबंधों का विस्तृत विश्लेषण किया।

अध्ययन के लिए IGP क्षेत्र में स्थित छह एरोनेट (AERONET) स्थलों के दीर्घकालिक आंकड़ों का उपयोग किया गया। इसके साथ ही SBDART रेडिएटिव ट्रांसफर मॉडल के जरिए यह समझने की कोशिश की गई कि एरोसोल और जल वाष्प पृथ्वी के विकिरण संतुलन को कैसे प्रभावित करते हैं। शोध में पाया गया कि स्वच्छ वायु स्थितियों में, जहां एरोसोल की मात्रा कम होती है, वहां जल वाष्प का विकिरण प्रभाव अत्यधिक मजबूत होता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, एरोसोल की मौजूदगी जल वाष्प के प्रभाव को संशोधित करती है। एरोसोल-युक्त वातावरण में जल वाष्प का प्रभाव वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि एरोसोल-मुक्त परिस्थितियों में यह प्रभाव सतह और निचले वायुमंडल दोनों पर तीव्र होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जल वाष्प वायुमंडल को एरोसोल की तुलना में कहीं अधिक गर्म करने की क्षमता रखता है।

इंडो-गंगा मैदान, जिसे दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में गिना जाता है, वहां एरोसोल और जल वाष्प की उच्च स्थानिक और कालिक परिवर्तनशीलता पाई जाती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में मानसून और क्षेत्रीय जलवायु पूर्वानुमान अक्सर चुनौतीपूर्ण बने रहते हैं। अध्ययन के नतीजे संकेत देते हैं कि यदि जलवायु मॉडलिंग में जल वाष्प और एरोसोल की संयुक्त भूमिका को सही तरीके से शामिल किया जाए, तो मानसून पूर्वानुमान और जलवायु आकलन कहीं अधिक सटीक हो सकते हैं।

एटमॉस्फेरिक रिसर्च जर्नल में प्रकाशित यह शोध भारत और ग्लोबल साउथ के लिए विशेष महत्व रखता है। यह अध्ययन न केवल जलवायु परिवर्तन की समझ को गहरा करता है, बल्कि नीति-निर्माताओं और वैज्ञानिकों को भविष्य की जलवायु रणनीतियां तैयार करने में भी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।