नीली अर्थव्यवस्था या नीला संकट? समुद्री रेत खनन की सच्चाई

Fri 16-Jan-2026,12:58 PM IST +05:30

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नीली अर्थव्यवस्था या नीला संकट? समुद्री रेत खनन की सच्चाई Blue Economy
  • समुद्री रेत खनन से प्रवाल, मछलियों और जैव विविधता को भारी नुकसान.

  • तटीय मछुआरा समुदायों की आजीविका और संस्कृति पर सीधा असर.

  • विकास की जरूरत बनाम पर्यावरण संरक्षण के बीच गंभीर टकराव.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / पानी के बाद रेत वह प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर आधुनिक विकास की इमारत खड़ी है। मकान, सड़क, पुल, बंदरगाह और स्मार्ट सिटी—सबकी नींव में रेत ही है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बुनियादी ढांचे की मांग ने रेत को रणनीतिक संसाधन बना दिया है। एक साधारण मकान में सैकड़ों टन रेत और एक किलोमीटर हाईवे में हजारों टन रेत का उपयोग इस निर्भरता को साफ दिखाता है। भारत में परंपरागत रूप से रेत नदियों, बाढ़ प्रभावित इलाकों और कृषि भूमि से आती रही है, लेकिन इन स्रोतों पर अत्यधिक दोहन ने पर्यावरणीय संकट पैदा कर दिया है। इसी दबाव के बीच सरकार तटीय और समुद्री रेत को वैकल्पिक और सतत स्रोत के रूप में देख रही है, ताकि जमीन आधारित स्रोतों पर निर्भरता घटाई जा सके। कागज पर यह नीति समाधान जैसी लगती है, लेकिन जमीनी और समुद्री हकीकत कहीं अधिक जटिल है।

समुद्र से रेत निकालने की प्रक्रिया तकनीकी रूप से उन्नत लेकिन पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील है। इसके लिए ड्रेजिंग जहाजों का इस्तेमाल किया जाता है, जो समुद्र की तलहटी से तलछट निकालते हैं। सक्शन ड्रेज जहाज ढीली रेत को वैक्यूम की तरह खींच लेते हैं, जबकि बकेट ड्रेज भारी कंटेनरों को समुद्र तल पर घसीटते हुए तलछट उखाड़ते हैं। यह प्रक्रिया केवल रेत को नहीं हटाती, बल्कि उन सूक्ष्म और स्थूल जीवों के पूरे आवास को नष्ट कर देती है, जो समुद्र तल की तलछट में रहते हैं। प्रवाल, शैवाल, केंचुए, छोटे क्रस्टेशियन और अनेक मछलियों के प्रजनन स्थल इसी तलछट पर निर्भर होते हैं। एक बार यह परत हट गई तो उसका प्राकृतिक पुनर्निर्माण दशकों में होता है, यदि हो भी पाए तो। केरल का कोल्लम तट इस बहस का केंद्र बनकर उभरा है। यह क्षेत्र समुद्री जैव विविधता के लिए जाना जाता है और यहां प्रवाल प्रजातियों की उल्लेखनीय विविधता पाई जाती है। प्रवाल केवल सुंदर संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ होते हैं। ये मछलियों को भोजन, आश्रय और प्रजनन का सुरक्षित स्थान देते हैं। जब ड्रेजिंग के जरिए समुद्र तल को खंगाला जाता है, तो प्रवाल संरचनाएं टूट जाती हैं, पानी में गाद फैल जाती है और प्रकाश का प्रवेश कम हो जाता है। इसका सीधा असर मछलियों की संख्या और प्रजातीय संतुलन पर पड़ता है। धीरे-धीरे स्थानीय प्रजातियां कम होने लगती हैं और बाहरी या कम उपयोगी प्रजातियां हावी हो जाती हैं, जिससे पारंपरिक मछली पकड़ने की व्यवस्था चरमरा जाती है।

कोल्लम केवल एक जैव विविध क्षेत्र नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यहां बड़ी संख्या में मछुआरा समुदाय पीढ़ियों से समुद्र पर निर्भर रहा है। मछली पकड़ना उनके लिए सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और सामाजिक संरचना का हिस्सा है। समुद्री खनन का असर सीधे उनके जीवन पर पड़ता है। मछली कम मिलती है, समुद्र का रास्ता बदलता है, और पारंपरिक ज्ञान बेकार होने लगता है। जब पकड़ घटती है, तो कर्ज बढ़ता है, पलायन होता है और सामाजिक तनाव पैदा होता है। यही वजह है कि तटीय समुदाय इस नीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनके लिए यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है।

सरकार का तर्क है कि समुद्री रेत खनन से अवैध नदी-रेत खनन पर रोक लगेगी और निर्माण क्षेत्र को स्थिर आपूर्ति मिलेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक संकट से बचने के लिए हम दूसरा, संभवतः अधिक गंभीर संकट तो नहीं खड़ा कर रहे? समुद्र की पारिस्थितिकी अत्यंत जटिल और कम समझी गई है। यहां हुए नुकसान का आकलन और उसकी भरपाई जमीन की तुलना में कहीं कठिन है। इसके अलावा, तटीय क्षरण, समुद्री जलस्तर में बदलाव और तूफानों की तीव्रता जैसे खतरे भी रेत खनन से बढ़ सकते हैं, जिसका असर अंततः तटीय शहरों और बुनियादी ढांचे पर ही पड़ेगा विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। रेत की मांग को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके विकल्पों पर गंभीरता से काम करना जरूरी है। निर्माण क्षेत्र में रीसायक्ल्ड कंस्ट्रक्शन वेस्ट, कृत्रिम रेत और वैकल्पिक सामग्रियों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, यदि समुद्री रेत खनन अपरिहार्य माना जाता है, तो इसके लिए सख्त पर्यावरणीय मूल्यांकन, सीमित क्षेत्र, चरणबद्ध खनन और स्थानीय समुदायों की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए। मछुआरों को केवल मुआवजा नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और दीर्घकालिक सुरक्षा की जरूरत है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि हमें विकास चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि हम किस कीमत पर विकास चाहते हैं। समुद्र केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि रेत की भूख में हम समुद्र की आत्मा को खो देंगे, तो उसका खामियाजा केवल मछुआरे नहीं, बल्कि पूरा समाज भुगतेगा। सतत विकास का अर्थ तभी सार्थक होगा, जब उसमें प्रकृति और मानव—दोनों की आवाज सुनी जाए।