कूनो में फिर गूंजा चीते का कदम: इतिहास की नई आहट
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Kuno National Park
बोत्सवाना से 9 नए चीते कूनो पहुंचे.
भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 47 हुई.
प्रोजेक्ट चीता को मिली नई गति.
Bhopal / मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क ने आज एक और ऐतिहासिक पल दर्ज किया। बोत्सवाना से अफ्रीकी महाद्वीप के 9 नए चीते विशेष विमान से भारत पहुंचे। यह प्रोजेक्ट चीता के तहत तीसरा बड़ा ट्रांसलोकेशन है, जिसने देश में चीता पुनर्वास की उम्मीदों को और मजबूत कर दिया है।
शुक्रवार रात करीब 9–10 बजे भारतीय वायुसेना का विशेष विमान ग्वालियर एयरफोर्स स्टेशन पर उतरा। यहां विशेषज्ञों की टीम ने चीतों की प्राथमिक स्वास्थ्य जांच की। इसके बाद शनिवार सुबह 8:30 बजे से दो हेलीकॉप्टरों के जरिए इन्हें कूनो के लिए रवाना किया गया, जबकि एक हेलीकॉप्टर विशेषज्ञ दल के साथ था। पार्क में सुरक्षित लैंडिंग के लिए 5 हेलीपैड तैयार किए गए थे। सुबह 9:30 बजे तक सभी चीतों को क्वारंटाइन बाड़ों में छोड़ दिया गया।
क्वारंटाइन और वैज्ञानिक निगरानी की प्रक्रिया
नए चीतों को कम से कम एक महीने तक विशेष क्वारंटाइन एनक्लोजर में रखा जाएगा। इस दौरान उनके स्वास्थ्य, व्यवहार और पर्यावरण के प्रति अनुकूलन की 24×7 निगरानी होगी। पशु चिकित्सक और वन अधिकारी लगातार उनकी स्थिति पर नजर रखेंगे ताकि वे पूरी तरह स्वस्थ और जंगली जीवन के लिए तैयार हो सकें।
यह पूरी प्रक्रिया तनाव-मुक्त और वैज्ञानिक तरीके से की जा रही है, जिससे चीतों को किसी भी प्रकार का जोखिम न हो। क्वारंटाइन के बाद उन्हें बड़े खुले क्षेत्रों में छोड़ा जाएगा, जहां वे प्राकृतिक शिकार के साथ अपना जीवन शुरू करेंगे।
प्रोजेक्ट चीता: एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मिसाल
प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत 2022 में नामीबिया से 8 चीतों के आगमन के साथ हुई थी। 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए। अब बोत्सवाना से आए 9 नए चीतों के साथ भारत में कुल संख्या 47 तक पहुंच गई है। यह वैश्विक वन्यजीव संरक्षण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
बोत्सवाना सरकार द्वारा भारत को चीते सौंपना दोनों देशों के मजबूत संबंधों का प्रतीक भी है। इस परियोजना का लक्ष्य 50 से अधिक चीतों की स्थायी आबादी स्थापित करना है, ताकि भारत में चीते का पुनर्वास स्थायी रूप से संभव हो सके।
कूनो की सफलता और बढ़ती उम्मीदें
कूनो नेशनल पार्क का 748 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीतों के लिए अनुकूल माना जाता है। यहां ब्लैकबक और चिंकारा जैसे पर्याप्त शिकार उपलब्ध हैं। अनुकूल पारिस्थितिकी के कारण कई मादा चीतों—जैसे गामिनी, ज्वाला और आशा—ने शावकों को जन्म दिया है। भारतीय जन्मे शावकों की संख्या 27 तक पहुंच चुकी है।
फिलहाल कूनो में 35 चीते हैं, जबकि 3 गांधी सागर अभयारण्य में रखे गए हैं। भविष्य में नौरादेही और अन्य अभयारण्यों में भी चीतों को शिफ्ट करने की योजना है, ताकि आबादी का विस्तार हो और जोखिम कम किया जा सके।
1952 से 2026 तक: एक अधूरे सपने की वापसी
भारत में चीता 1952 में विलुप्त घोषित कर दिया गया था। सात दशक बाद यह सपना फिर से साकार होता दिखाई दे रहा है। बोत्सवाना, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के सहयोग से भारत ने न केवल एक विलुप्त प्रजाति को वापस लाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन को भी मजबूत किया है।
मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र की संयुक्त टीम दिन-रात इस मिशन को सफल बनाने में जुटी है। कूनो में गूंजती चीतों की हलचल वन्यजीव प्रेमियों के लिए गर्व और उत्साह का कारण है। यह सिर्फ एक परियोजना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भारत के रिश्ते को फिर से जीवंत करने का प्रयास है।