भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस: संघर्ष, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय का ऐतिहासिक प्रतीक
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1818 की भीमा कोरेगांव लड़ाई की ऐतिहासिक स्मृति.
सामाजिक न्याय और दलित चेतना का प्रतीक दिवस.
संविधान, समानता और स्वाभिमान का संदेश.
AGCNN / भारत का इतिहास केवल राजाओं, किलों और साम्राज्यों की कहानी नहीं है, बल्कि उन समुदायों के संघर्ष की भी गाथा है, जिन्होंने अन्याय और अपमान के विरुद्ध अपनी पहचान और आत्मसम्मान की रक्षा की। इसी संघर्ष की स्मृति से जुड़ा है भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस, जो हर वर्ष 1 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन 1818 में हुई भीमा कोरेगांव की लड़ाई की याद दिलाता है, लेकिन इसके मायने एक सैन्य विजय से कहीं आगे जाकर सामाजिक चेतना और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं।
उन्नीसवीं सदी के आरंभ में भारत की राजनीतिक स्थिति अस्थिर थी। मराठा साम्राज्य कमजोर पड़ रहा था और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थी। इसी दौर में पेशवा बाजीराव द्वितीय और ब्रिटिश सेना के बीच टकराव हुआ। 1 जनवरी 1818 को पुणे के पास भीमा नदी के तट पर स्थित कोरेगांव गांव में यह ऐतिहासिक संघर्ष लड़ा गया। संख्या और संसाधनों में कम होने के बावजूद ब्रिटिश सेना ने पेशवा की बड़ी फौज का सामना किया और अंततः उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
इस लड़ाई को केवल सामरिक दृष्टि से देखने पर इसका सामाजिक पक्ष छिप जाता है। ब्रिटिश सेना में शामिल कई सैनिक महार समुदाय से थे, जो उस समय सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का दंश झेल रहे थे। पेशवा शासन के दौरान इन समुदायों को सार्वजनिक जीवन से दूर रखा जाता था और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। ऐसे में भीमा कोरेगांव की लड़ाई उन लोगों के लिए आत्मसम्मान की लड़ाई बन गई, जिन्हें सदियों से हाशिये पर रखा गया था।
लड़ाई के बाद ब्रिटिश शासन ने इस संघर्ष में भाग लेने वाले सैनिकों की स्मृति में एक विजय स्तंभ का निर्माण कराया। इसी स्तंभ ने आगे चलकर भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस का रूप लिया। समय के साथ यह स्थान केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं रहा, बल्कि सामाजिक एकत्रीकरण और विचार विमर्श का केंद्र बन गया। हर साल 1 जनवरी को बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं और समानता तथा न्याय के मूल्यों को याद करते हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव की घटना को विशेष महत्व दिया। उन्होंने इसे केवल अंग्रेजों की जीत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में समझा, जिसने एक बड़े वर्ग को सम्मान से वंचित रखा था। आंबेडकर के विचारों के प्रभाव से यह दिवस दलित चेतना और सामाजिक अधिकारों के आंदोलन से जुड़ गया। यही कारण है कि शौर्य दिवस के अवसर पर इतिहास के साथ-साथ सामाजिक न्याय, संविधान और लोकतंत्र पर भी चर्चा होती है।
भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक आयोजन बन गया। इसमें विभिन्न वर्गों के लोग शामिल होने लगे और यह दिन वंचितों की साझा आवाज के रूप में उभर आया। सांस्कृतिक कार्यक्रम, विचार गोष्ठियां और स्मृति सभाएं इस दिन की पहचान बन चुकी हैं। यह आयोजन न केवल अतीत को याद करने का अवसर देता है, बल्कि वर्तमान सामाजिक स्थितियों पर विचार करने की प्रेरणा भी देता है।
हालांकि, इस दिवस से जुड़े विवाद भी समय-समय पर सामने आए हैं। इतिहास की अलग-अलग व्याख्याएं और राजनीतिक दृष्टिकोण इस दिन को लेकर मतभेद पैदा करते हैं। फिर भी, भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस की मूल भावना संघर्ष, स्वाभिमान और समानता की रही है। यह दिन यह याद दिलाता है कि इतिहास को समझने के लिए केवल सत्ता की दृष्टि पर्याप्त नहीं होती, बल्कि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के अनुभवों को भी महत्व देना आवश्यक है।
आज के समय में भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस का महत्व और बढ़ जाता है। यह सामाजिक भेदभाव, असमानता और अन्याय के विरुद्ध जागरूकता पैदा करता है। युवाओं के लिए यह दिवस अपने इतिहास को जानने और संविधान में निहित मूल्यों को समझने का अवसर बनता है। यह संदेश देता है कि लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और समानता की भावना से मजबूत होता है।
अंत में कहा जा सकता है कि भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस केवल 1818 की एक लड़ाई की याद नहीं है। यह आत्मसम्मान, संघर्ष और अधिकारों की निरंतर यात्रा का प्रतीक है। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला यह दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि सच्चा शौर्य केवल युद्धभूमि में दिखाई देने वाला साहस नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के खिलाफ लगातार खड़े रहने की ताकत भी है। यही वजह है कि भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस इतिहास से निकलकर वर्तमान और भविष्य की चेतना से जुड़ जाता है।