सोमनाथ के शिलालेखों में सोलंकी युग और कुमारपाल के पुनरुद्धार की गाथा
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भद्रकाली मंदिर का शिलालेख सोमनाथ के निर्माण, विनाश और पुनरुद्धार का क्रमबद्ध ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता है
सोलंकी युग में कुमारपाल की भूमिका ने सोमनाथ को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में पुनर्स्थापित किया
प्रभास पाटन संग्रहालय शिलालेखों और अवशेषों के माध्यम से सनातन विरासत को संरक्षित कर रहा है
दिल्ली/ गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ क्षेत्र के शिलालेख और पुरातात्विक अवशेष भारत के प्राचीन इतिहास, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पुनरुद्धार की सशक्त कहानी कहते हैं। इन प्रमाणों में सोलंकी कालीन वास्तुकला, भद्रकाली मंदिर के शिलालेख और कुमारपाल द्वारा कराए गए पुनर्निर्माण का क्रमबद्ध उल्लेख मिलता है। यह विरासत न केवल अतीत का दस्तावेज है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा भी है।
प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर क्षेत्र में बिखरे शिलालेख, तांबे की प्लेटें और प्राचीन स्मारक पत्थर गुजरात के गौरवशाली इतिहास की जीवंत गवाही देते हैं। इन ऐतिहासिक साक्ष्यों में सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमणों, उसके पुनर्निर्माण और सनातन संस्कृति की अविच्छिन्न धारा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। आज ये अमूल्य अवशेष प्रभास पाटन संग्रहालय में संरक्षित हैं, जो वर्तमान में पुराने सूर्य मंदिर परिसर में संचालित हो रहा है।
संग्रहालय में रखे गए अवशेष केवल पत्थर या धातु के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि वे वीरता, भक्ति और आत्मसम्मान की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हैं। हमलों के दौरान नष्ट हुए मंदिर के अंश, शिलालेखों की टूटी पट्टिकाएँ और तांबे की प्लेटें यह दर्शाती हैं कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है।
ऐसा ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण शिलालेख भद्रकाली गली, प्रभास पाटन में स्थित है। यह शिलालेख पुराने राम मंदिर के पास, सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर के आंगन में सुरक्षित है और प्राचीन भद्रकाली मंदिर की दीवार में जड़ा हुआ है। यह शिलालेख राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है और सोमनाथ के इतिहास को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करता है।
प्रभास पाटन संग्रहालय के क्यूरेटर श्री तेजल परमार के अनुसार, यह शिलालेख 1169 ईस्वी (वल्लभी संवत 850 एवं विक्रम संवत 1255) का है। इसे अन्हिलवाड़ पाटन के महाराजाधिराज कुमारपाल के आध्यात्मिक गुरु, परम पशुपत आचार्य श्रीमान भावबृहस्पति की प्रशंसा में रचित किया गया था। यह शिलालेख सोमनाथ मंदिर के प्राचीन एवं मध्यकालीन इतिहास का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।
शिलालेख में चारों युगों में सोमनाथ महादेव के निर्माण का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार—
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सत्य युग में चंद्रदेव (सोम) ने सोने का मंदिर बनवाया
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त्रेता युग में रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया
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द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने लकड़ी का मंदिर बनवाया
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कलियुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने भव्य पत्थर का मंदिर निर्मित कराया
इतिहासकारों के अनुसार, भीमदेव सोलंकी द्वारा निर्मित चौथे मंदिर के अवशेषों पर ही 1169 ईस्वी में कुमारपाल ने पाँचवें मंदिर का निर्माण कराया। सोलंकी शासनकाल में प्रभास पाटन धर्म, वास्तुकला और साहित्य का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। सिद्धराज जयसिंह का न्यायप्रिय शासन और कुमारपाल की गहरी भक्ति ने सोमनाथ को गुजरात के स्वर्ण युग का प्रतीक बना दिया।
आज प्रभास पाटन की भूमि केवल खंडहरों की कहानी नहीं कहती, बल्कि सनातन धर्म की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक गौरव को जीवित रखे हुए है। भद्रकाली शिलालेख जैसे प्रमाण यह दर्शाते हैं कि भक्ति, वीरता और आत्मसम्मान समय की सीमाओं से परे हैं और आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करते रहेंगे।