जानिए सनातन रहस्य- मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख पर क्यों लिखा जाता है 94
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Manikarnika-Ghat-94-Meaning
मणिकर्णिका घाट पर चिता की भस्म पर लिखा जाने वाला 94 सनातन कर्म सिद्धांत और जीवन-मृत्यु के गूढ़ दर्शन को दर्शाता है।
94 कर्म व्यक्ति के नियंत्रण में और 6 कर्म विधि के अधीन माने जाते हैं, यही मान्यता इस अनूठी परंपरा का आधार है।
Kashi/ काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। यहां स्थित मणिकर्णिका घाट सनातन संस्कृति में केवल अंतिम संस्कार का स्थान नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के गूढ़ सत्य को समझने की सबसे बड़ी पाठशाला माना जाता है। प्रतिदिन असंख्य लोग यहां अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने पहुंचते हैं, लेकिन इस घाट से जुड़ी एक विशेष परंपरा के अर्थ से बहुत कम लोग परिचित हैं।
जब शव पंचतत्व में विलीन हो जाता है और चिता शांत हो जाती है, तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता की भस्म पर एक संख्या लिखता है 94। यह संख्या साधारण नहीं, बल्कि सनातन दर्शन की एक गहन मान्यता का प्रतीक है।
94 का क्या है अर्थ?
सनातन परंपरा के अनुसार, मनुष्य का जीवन 100 कर्मों के चक्र से जुड़ा माना जाता है। इनमें से 94 कर्म ऐसे होते हैं, जो व्यक्ति के अपने नियंत्रण में होते हैं— जैसे सत्य बोलना, सेवा करना, हिंसा या अहिंसा का चयन, दान, संयम और कर्तव्य पालन। शेष 6 कर्म विधि या ईश्वर के अधीन माने जाते हैं, जिन पर मनुष्य का कोई वश नहीं होता।
मान्यता है कि मृत्यु के साथ व्यक्ति के 94 कर्म इसी लोक में समाप्त हो जाते हैं, जबकि वे 6 कर्म आत्मा के साथ अगले जन्म की यात्रा पर निकलते हैं। इसी दर्शन के प्रतीक स्वरूप चिता की राख पर 94 अंकित किया जाता है। यह संकेत होता है कि व्यक्ति अपने सांसारिक कर्मों से मुक्त हो चुका है और अब नियति आगे का मार्ग तय करेगी।
गीता और कर्म सिद्धांत
भगवद गीता में भी उल्लेख मिलता है कि मृत्यु के बाद आत्मा मन और पांच ज्ञानेन्द्रियों के साथ आगे बढ़ती है। यही कुल संख्या 6 मानी जाती है। यही कर्म यह तय करते हैं कि अगला जन्म कहां, किन परिस्थितियों में और किस परिवेश में होगा।
कर्मों का जीवन संदेश
मणिकर्णिका घाट की यह परंपरा जीवन को लेकर एक गहरा संदेश देती है- मनुष्य को अपने जीवन में अधिकतम शुभ और सत्कर्म करने चाहिए, क्योंकि अंततः वही उसके अगले अस्तित्व की नींव बनते हैं।
सनातन दर्शन में सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा, दान, संयम, भक्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व को सर्वोच्च कर्म माना गया है। वहीं लाभ-हानि, जीवन-मरण, यश-अपयश जैसे तत्व ईश्वरीय विधान के अधीन माने जाते हैं।
मणिकर्णिका की सीख
मणिकर्णिका घाट केवल मृत्यु का प्रतीक नहीं, बल्कि यह जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई को समझने का स्थान है। यहां की यह परंपरा याद दिलाती है कि जीवन कर्म करने के लिए है और मृत्यु कर्मों के लेखे-जोखे का द्वार।