उपराष्ट्रपति ने सिंधी में संविधान जारी, देवनागरी-फारसी दोनों लिपि में
ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |
Constitution-Sindhi-Language-Release-Dual-Script-India
उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषा दिवस पर देवनागरी और फारसी लिपि में संविधान का सिंधी संस्करण जारी किया।
इस पहल को भाषाई समावेशिता और नागरिकों को उनकी मातृभाषा में संविधान समझाने की दिशा में अहम कदम बताया गया।
Delhi/ भारत के उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने आज उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में संविधान का सिंधी भाषा में नवीनतम संस्करण जारी किया। यह संस्करण देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों में प्रकाशित किया गया है, जिससे सिंधी भाषी समुदाय को अपनी मातृभाषा में संविधान समझने का अवसर मिलेगा।
सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषी समुदाय को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सिंधी भाषा भारत की प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है। उन्होंने कहा कि इस भाषा की साहित्यिक परंपरा वेदांतिक दर्शन और सूफी विचारों का अद्भुत संगम है, जो एकता, प्रेम और भाईचारे जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
उपराष्ट्रपति ने इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार सिंधी भाषा में, विशेष रूप से देवनागरी लिपि में संविधान का प्रकाशन किया गया है। उन्होंने कहा कि यह कदम भाषाई समावेशिता को बढ़ावा देने के साथ-साथ नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है और लोकतांत्रिक शासन की दिशा तय करता है। इस तरह की पहल से नागरिकों और शासन के बीच की दूरी कम होती है और लोगों का विश्वास मजबूत होता है।
उपराष्ट्रपति ने Narendra Modi के नेतृत्व में चल रही उन पहलों की सराहना की, जिनके तहत संविधान को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास देश की भाषाई विविधता का सम्मान करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है।
उन्होंने बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली जैसी भाषाओं में संविधान उपलब्ध कराने के प्रयासों का भी उल्लेख किया और कहा कि इससे अधिक से अधिक लोग अपनी भाषा में संविधान को समझ सकते हैं।
सिंधी समुदाय के इतिहास का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन के बाद भी इस समुदाय ने अपनी भाषा और संस्कृति को जीवित रखा। उन्होंने बताया कि 1967 में 21वें संविधान संशोधन के जरिए सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान को मान्यता मिली।
कार्यक्रम में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री Arjun Ram Meghwal, राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष Vasudev Devnani, सांसद Shankar Lalwani और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
उपराष्ट्रपति ने अंत में नागरिकों से अपनी मातृभाषाओं के साथ-साथ देश की विविध भाषाई विरासत का सम्मान करने का आह्वान किया और विश्वास जताया कि ऐसी पहलें भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में सहायक होंगी।