बच्चों और युवाओं में तेजी से बढ़ रहा एडीएचडी: ध्यान की कमी और अति सक्रियता बन रही बड़ी चुनौती
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ADHD Disorder
बच्चों और युवाओं में तेजी से बढ़ रही ADHD की समस्या.
समय पर पहचान और सही उपचार से संभव सुधार.
परिवार और स्कूल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण.
Delhi / आधुनिक जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं। इन्हीं में से एक है अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी), जिसे हिंदी में ध्यान की कमी और अत्यधिक सक्रियता विकार कहा जाता है। यह एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जो मुख्य रूप से बच्चों में पाया जाता है, लेकिन कई मामलों में इसके लक्षण युवावस्था और वयस्क जीवन तक बने रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार एडीएचडी से प्रभावित व्यक्ति को किसी काम पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है, साथ ही वह अक्सर अत्यधिक सक्रिय या आवेगपूर्ण व्यवहार करता है। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में यह समस्या अधिक देखने को मिल रही है, जहां वे पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकने, जल्दी ऊब जाने या एक ही जगह शांत बैठने में असमर्थता जैसी परेशानियों का सामना करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कई बार माता-पिता इसे सामान्य शरारत या अनुशासनहीनता समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में यह एक चिकित्सकीय स्थिति होती है जिसे समय पर पहचानना और सही उपचार देना बेहद जरूरी होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठनों के अनुमान के अनुसार दुनिया भर में करोड़ों बच्चे इस समस्या से प्रभावित हैं, और भारत में भी इसके मामलों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखी जा रही है। डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग, स्क्रीन टाइम में वृद्धि, पढ़ाई का बढ़ता दबाव और असंतुलित जीवनशैली भी इस समस्या को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल माने जा रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एडीएचडी का समय रहते उपचार और प्रबंधन किया जाए तो प्रभावित बच्चों का जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ सकता है। इसके लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श, व्यवहारिक थेरेपी, विशेष शिक्षण तकनीकों और कुछ मामलों में दवाओं का सहारा लिया जाता है। परिवार और स्कूल का सहयोग इस प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि शिक्षक और माता-पिता बच्चे के व्यवहार को समझकर उसे सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करें, तो उसकी एकाग्रता और आत्मविश्वास में काफी सुधार आ सकता है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि एडीएचडी से पीड़ित बच्चों में कई बार रचनात्मकता, ऊर्जा और नई चीजें सीखने की क्षमता भी अधिक होती है, इसलिए उन्हें सही मार्गदर्शन देना आवश्यक होता है। हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ने के कारण लोग अब ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञों की सलाह लेने लगे हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों और समाज में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देना समय की जरूरत है, ताकि एडीएचडी जैसी स्थितियों को लेकर भ्रांतियां दूर हों और प्रभावित बच्चों को उचित समर्थन मिल सके। यदि शुरुआती अवस्था में ही इस विकार की पहचान कर ली जाए और बच्चे को सहायक वातावरण प्रदान किया जाए, तो वह अपनी क्षमताओं का बेहतर उपयोग करते हुए जीवन में आगे बढ़ सकता है और समाज में सकारात्मक योगदान भी दे सकता है।