मां बनने की उम्मीद का नया रास्ता: IVF क्या है, कैसे काम करता है और किन लोगों के लिए है यह उपचार
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IVF-Process
IVF से बांझपन के इलाज में नई उम्मीद.
चरणबद्ध प्रक्रिया और आधुनिक तकनीक.
विशेष परिस्थितियों में प्रभावी उपचार.
Nagpur / आज के समय में बदलती जीवनशैली, तनाव, देर से विवाह और कई स्वास्थ्य कारणों के चलते बड़ी संख्या में दंपती संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में मेडिकल साइंस ने प्रजनन उपचार के क्षेत्र में कई नई तकनीकें विकसित की हैं, जिनमें IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक महत्वपूर्ण और प्रभावी विकल्प माना जाता है। आम भाषा में कहा जाए तो IVF एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें महिला के शरीर के बाहर अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है और फिर उसे महिला के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। यह तकनीक उन दंपतियों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आई है, जिन्हें सामान्य तरीके से गर्भधारण में कठिनाई होती है।
IVF की प्रक्रिया को समझने के लिए इसके विभिन्न चरणों को जानना जरूरी है। सबसे पहले महिला को कुछ विशेष हार्मोनल दवाएं दी जाती हैं, जिनका उद्देश्य अंडाशय को उत्तेजित करना होता है ताकि एक से अधिक अंडाणु विकसित हो सकें। सामान्य स्थिति में महिला के शरीर में हर महीने एक ही अंडाणु बनता है, लेकिन IVF में सफलता की संभावना बढ़ाने के लिए अधिक अंडाणुओं की जरूरत होती है। इस दौरान डॉक्टर अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट के जरिए अंडाणुओं की ग्रोथ पर नजर रखते हैं। जब अंडाणु पूरी तरह विकसित हो जाते हैं, तब एक छोटी सी प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें अंडाशय से बाहर निकाला जाता है।
दूसरे चरण में पुरुष से वीर्य सैंपल लिया जाता है। इस सैंपल को लैब में विशेष तकनीक से साफ किया जाता है, ताकि सबसे स्वस्थ और सक्रिय शुक्राणु चुने जा सकें। इसके बाद लैब में अंडाणु और शुक्राणु को मिलाया जाता है। यही वह चरण है जहां निषेचन होता है और भ्रूण का निर्माण शुरू होता है। कुछ मामलों में, जब शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता कम होती है, तब आईसीएसआई तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसमें एक ही शुक्राणु को सीधे अंडाणु के अंदर इंजेक्ट किया जाता है।
निषेचन के बाद बने भ्रूण को कुछ दिनों तक लैब में विशेष वातावरण में रखा जाता है। इस दौरान भ्रूण के विकास पर लगातार नजर रखी जाती है। आमतौर पर तीन से पांच दिन बाद, जब भ्रूण अच्छी अवस्था में पहुंच जाता है, तब उसे महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। यह प्रक्रिया सामान्यतः दर्दरहित होती है और इसके लिए अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती रहने की आवश्यकता नहीं होती। भ्रूण स्थानांतरण के बाद महिला को कुछ दवाएं दी जाती हैं, जो गर्भाशय की परत को मजबूत बनाती हैं ताकि भ्रूण आसानी से स्थापित हो सके।
अब बात करते हैं कि IVF प्रक्रिया में कितना समय लगता है। एक पूरा IVF साइकिल आमतौर पर चार से छह सप्ताह का होता है। इसमें शुरुआती जांच, हार्मोनल दवाओं का कोर्स, अंडाणु निकालने की प्रक्रिया, भ्रूण निर्माण और अंत में भ्रूण स्थानांतरण शामिल होता है। भ्रूण ट्रांसफर के लगभग 10 से 14 दिन बाद प्रेग्नेंसी टेस्ट किया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि प्रक्रिया सफल रही या नहीं। कुछ मामलों में पहली बार में ही सफलता मिल जाती है, जबकि कई बार एक से अधिक साइकिल की आवश्यकता पड़ सकती है।
IVF हर किसी के लिए जरूरी या उपयुक्त नहीं होता, बल्कि यह विशेष परिस्थितियों में अपनाया जाने वाला उपचार है। यह उन महिलाओं के लिए लाभकारी होता है जिनकी फैलोपियन ट्यूब बंद या क्षतिग्रस्त होती है। इसके अलावा जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होती है या उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती, उनके लिए भी IVF एक अच्छा विकल्प है। एंडोमेट्रियोसिस, ओव्यूलेशन की समस्या, अनएक्सप्लेंड इनफर्टिलिटी यानी बिना स्पष्ट कारण के बांझपन और अधिक उम्र में गर्भधारण की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए भी यह तकनीक सहायक साबित होती है।
IVF का निर्णय लेने से पहले दंपती को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तैयार रहना चाहिए। यह प्रक्रिया केवल मेडिकल नहीं, बल्कि धैर्य और सकारात्मक सोच की भी परीक्षा होती है। इसके साथ ही सही जानकारी, अनुभवी डॉक्टर और विश्वसनीय सेंटर का चुनाव करना भी बेहद जरूरी होता है। कुल मिलाकर IVF ने उन लाखों दंपतियों के जीवन में खुशियां लौटाई हैं, जो वर्षों से संतान की कामना कर रहे थे। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की यह उपलब्धि आज उम्मीद और विश्वास का मजबूत आधार बन चुकी है।