नई ज़िंदगी की जंग: जब स्पर्म से भिड़ जाता है शरीर का इम्यून सिस्टम

Sat 10-Jan-2026,01:33 AM IST +05:30

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नई ज़िंदगी की जंग: जब स्पर्म से भिड़ जाता है शरीर का इम्यून सिस्टम Sperm_-Immune-System
  • शरीर का इम्यून सिस्टम स्पर्म के लिए चुनौतियाँ बनता है.

  • केवल सबसे मजबूत और स्वस्थ स्पर्म सफल होते हैं.

  • प्राकृतिक चयन जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है.

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / नई ज़िंदगी की शुरुआत जितनी खूबसूरत होती है, उसके पीछे की प्रक्रिया उतनी ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण भी होती है। यह किसी फिल्मी एक्शन सीन से कम नहीं, जहां करोड़ों स्पर्म एक लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, लेकिन रास्ते में शरीर का सुरक्षा तंत्र उनके सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। जैसे ही स्पर्म महिला के शरीर में प्रवेश करते हैं, शरीर का इम्यून सिस्टम उन्हें “बाहरी हमलावर” मान लेता है। इसके बाद शुरू होती है एक जैविक जंग, जिसमें केवल सबसे मजबूत और सक्षम स्पर्म ही आगे बढ़ पाता है। यही प्रकृति का नियम है, जो आने वाली संतान के स्वास्थ्य और मजबूती को सुनिश्चित करता है।

इस संघर्ष की पहली परीक्षा योनि का एसिडिक वातावरण होता है। योनि का पीएच स्तर स्वाभाविक रूप से एसिडिक होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य हानिकारक बैक्टीरिया और संक्रमण से शरीर की रक्षा करना है। लेकिन इस सुरक्षा कवच की चपेट में सबसे पहले स्पर्म ही आते हैं। जैसे ही करोड़ों स्पर्म इस एसिडिक माहौल में प्रवेश करते हैं, उनमें से लाखों यहीं नष्ट हो जाते हैं। यह एक तरह की “एसिड की नदी” होती है, जिसे पार कर पाना हर स्पर्म के बस की बात नहीं। केवल वही स्पर्म आगे बढ़ पाते हैं जो इस कठोर वातावरण को झेलने की क्षमता रखते हैं।

जो स्पर्म इस पहली बाधा को पार कर लेते हैं, उनके सामने अगली चुनौती होती है शरीर का इम्यून सिस्टम। गर्भाशय में पहुंचते ही सफेद रक्त कोशिकाएं यानी व्हाइट ब्लड सेल्स (WBCs) सक्रिय हो जाती हैं। ये कोशिकाएं शरीर की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती हैं और किसी भी बाहरी तत्व को दुश्मन समझकर उस पर हमला कर देती हैं। स्पर्म भी इनके लिए अपवाद नहीं होते। WBCs उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट करने लगती हैं। इस चरण में भी करोड़ों में से हजारों स्पर्म अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते और यहीं खत्म हो जाते हैं।

इसके बाद स्पर्म को सर्वाइकल म्यूकस की चुनौती का सामना करना पड़ता है। यह म्यूकस एक चिपचिपे जाल की तरह होता है, जो स्पर्म की गति को धीमा कर देता है। इसे अक्सर मकड़ी के जाले से तुलना की जाती है, जिसमें फंसने के बाद आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, ओवुलेशन के समय यही म्यूकस थोड़ा पतला और अनुकूल हो जाता है, ताकि कुछ चुने हुए स्पर्म आगे बढ़ सकें। फिर भी, यह बाधा कमजोर और अस्वस्थ स्पर्म को रोकने का काम करती है।

इन तमाम कठिन चरणों को पार करने के बाद भी मंज़िल तक पहुंचने वाले स्पर्म की संख्या बेहद कम रह जाती है। करोड़ों की इस सेना में से केवल 200 से 300 स्पर्म ही अंडाणु के आसपास तक पहुंच पाते हैं। लेकिन प्रकृति का नियम यहां भी साफ है—इनमें से भी केवल एक ही स्पर्म अंडाणु के साथ मिलकर निषेचन कर पाता है। वही एक “सुपर-चैंपियन” स्पर्म नई ज़िंदगी की नींव रखता है। हम सभी उसी एक विजेता स्पर्म की जीत का परिणाम हैं।

यह पूरी प्रक्रिया दर्शाती है कि शरीर का यह सुरक्षा तंत्र केवल रक्षा के लिए नहीं, बल्कि चयन के लिए भी काम करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल सबसे स्वस्थ, मजबूत और सक्षम स्पर्म ही आगे बढ़े। यही कारण है कि प्रकृति ने प्रजनन को इतना जटिल और सुरक्षित बनाया है। यह सिर्फ जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि गुणवत्ता और संतुलन बनाए रखने की एक अद्भुत प्रणाली है। मानव शरीर के भीतर चलने वाली यह अदृश्य जंग हमें यह एहसास कराती है कि जीवन की हर शुरुआत के पीछे संघर्ष, चयन और प्रकृति की गहरी समझ छिपी होती है।