पीटर नवारो का AI पर बयान: भारत, ChatGPT और अमेरिका की असल सच्चाई

Mon 19-Jan-2026,03:17 PM IST +05:30

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पीटर नवारो का AI पर बयान: भारत, ChatGPT और अमेरिका की असल सच्चाई Peter Navarro
  • भारत अमेरिकी AI कंपनियों के लिए डेटा और राजस्व का बड़ा स्रोत.

  • ChatGPT और AI सेवाओं से अमेरिकी टेक को सीधा आर्थिक लाभ.

  • AI के जरिए अमेरिका की वैश्विक तकनीकी पकड़ मजबूत.

Delhi / Delhi :

Delhi / व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जो तथ्यों से ज़्यादा राजनीतिक कुंठा और अधूरी समझ को दर्शाता है। ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म को लेकर उनका तर्क सुनने में भले ही राष्ट्रवादी लगे, लेकिन ज़मीनी हकीकत उससे बिल्कुल अलग है। यह कहना कि अमेरिका की जमीन और बिजली पर चलने वाले AI प्लेटफॉर्म का फायदा भारत, चीन और दूसरे देशों को मिल रहा है, न सिर्फ अधूरा सच है बल्कि वैश्विक टेक इकोनॉमी की बुनियादी समझ की कमी भी दिखाता है।

हकीकत यह है कि अमेरिकी कंपनियां—चाहे OpenAI हो, Google हो या Microsoft—भारत में कोई सेवा दान में नहीं दे रहीं। वे यहां पूरी तरह सोची-समझी रणनीति और भारी आर्थिक लाभ के लिए मौजूद हैं। भारत आज AI के लिए सिर्फ एक “यूज़र बेस” नहीं, बल्कि डेटा, रेवेन्यू, टैलेंट और भू-राजनीतिक प्रभाव का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। AI मॉडल की ताकत इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कितना विशाल, विविध और वास्तविक दुनिया का डेटा मिलता है। भारत जैसे देश में 140 करोड़ लोग हैं, दर्जनों भाषाएं, बोलियां, सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता और हर तरह के उपयोग व्यवहार मौजूद हैं। इससे बेहतर “ट्रेनिंग ग्राउंड” किसी भी AI कंपनी को दुनिया में नहीं मिल सकता।

लाखों भारतीय जब ChatGPT जैसे टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, तो वे सिर्फ सवाल नहीं पूछते, बल्कि अनजाने में उस AI को बेहतर बनाते हैं। Reinforcement Learning from Human Feedback यानी RLHF का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी कंपनियों को ही मिलता है। यही वजह है कि उनके मॉडल ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा सटीक और ज्यादा ग्लोबल बनते जा रहे हैं। ऐसे में यह तर्क देना कि भारत सिर्फ “फायदा उठा रहा है”, सरासर गलत है।

यह भी कहना कि भारत में AI सेवाएं मुफ्त में इस्तेमाल हो रही हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। भारत में लाखों लोग ChatGPT Plus, Gemini Advanced और Claude Pro जैसे प्रीमियम प्लान्स के लिए हर महीने डॉलर में भुगतान कर रहे हैं। इसके अलावा भारत की बड़ी IT कंपनियां—जैसे TCS, Infosys और Wipro—अमेरिकी AI मॉडल्स के API इस्तेमाल करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रही हैं। भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम, Azure, AWS और Google Cloud का सबसे बड़ा ग्राहक बन चुका है। यानी पैसा लगातार भारत से अमेरिका की ओर जा रहा है।

आंकड़े भी इस सच्चाई की पुष्टि करते हैं। ChatGPT के कुल वैश्विक ट्रैफिक में भारत की हिस्सेदारी करीब 9 प्रतिशत है, जो अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर है। इसमें बड़ी संख्या में पेड यूज़र्स शामिल हैं। यही वजह है कि अमेरिकी टेक दिग्गज भारत को हल्के में नहीं लेते। Microsoft, Google और Amazon ने मिलकर भारत के AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में करीब 67 बिलियन डॉलर से अधिक निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। अकेले Microsoft ने भारत में AI विस्तार के लिए 17.5 बिलियन डॉलर निवेश की घोषणा की है। कोई भी कंपनी ऐसा निवेश “परोपकार” में नहीं करती।

भारत का जनरेटिव AI बाजार 2025 तक 7.3 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और इस बाजार के सबसे बड़े हिस्से पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा है। अगर वे भारत से दूर रहतीं, तो यह खाली जगह तुरंत चीनी AI कंपनियां—जैसे Baidu और Alibaba—भर देतीं। भारत में मौजूद रहकर अमेरिकी कंपनियां सिर्फ मुनाफा नहीं कमा रहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही हैं कि भविष्य की वैश्विक तकनीक पर अमेरिका का दबदबा बना रहे। यह एक साफ भू-राजनीतिक जीत है, जहां दुनिया का डिजिटल ढांचा अमेरिकी तकनीक पर निर्भर होता जा रहा है।

भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा सॉफ्टवेयर डेवलपर्स हैं। जब ये डेवलपर्स GPT-4, Llama या अन्य अमेरिकी AI मॉडल्स पर ऐप और सॉफ्टवेयर बनाते हैं, तो वे अमेरिकी टेक इकोसिस्टम को और मजबूत करते हैं। इससे अमेरिकी स्टैंडर्ड्स पूरी दुनिया में स्थापित होते हैं। साथ ही, ग्लोबल स्केल पर AI चलाने से प्रति यूज़र लागत कम होती है। अगर AI सिर्फ अमेरिका तक सीमित रहता, तो उसका R&D खर्च कहीं ज्यादा होता। भारत जैसे बड़े बाजार के कारण यह लागत वसूल भी होती है और मुनाफा भी बढ़ता है।

पीटर नवारो ने यह बयान ‘रियल अमेरिका वॉयस’ चैनल पर स्टीव बैनन के साथ इंटरव्यू में दिया, जहां उन्होंने खेती की जमीन और विदेशी निवेश को लेकर भी डर जताया। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव है। रूस से तेल खरीदने को लेकर डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ की धमकी और ट्रेड डील पर अनबन पहले से मौजूद है। ऐसे माहौल में नवारो के बयान को तथ्य से ज्यादा घरेलू राजनीति और दबाव की रणनीति के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

कुल मिलाकर, यह साफ है कि भारत और अमेरिका के बीच AI का रिश्ता एकतरफा नहीं, बल्कि पूरी तरह पारस्परिक लाभ पर आधारित है। अमेरिका को डेटा, रेवेन्यू, स्केल और ग्लोबल वर्चस्व मिलता है, जबकि भारत को टेक्नोलॉजी, निवेश और अवसर। इसे “अमेरिका का नुकसान” बताना न सिर्फ गलत है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है।