परिसीमन बहस तेज: 2026 के बाद लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ने की संभावना
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2026 के बाद परिसीमन प्रक्रिया शुरू होने की संभावना, जिससे लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 तक पहुंच सकती है।
महिला आरक्षण लागू करने और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए सीटों का विस्तार जरूरी माना जा रहा है, जिससे राज्यों के संतुलन पर असर पड़ेगा।
New Delhi/ देश में महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। संसद में चल रही चर्चाओं के बीच सरकार का संकेत है कि 2026 के बाद लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़कर लगभग 850 तक हो सकती है।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास पर नजर डालें तो सीटों में वृद्धि कोई नई प्रक्रिया नहीं है। 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव में लोकसभा की कुल 489 सीटें थीं। उस समय देश की जनसंख्या और प्रशासनिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यह संख्या तय की गई थी।
इसके बाद 1957 के चुनाव में सीटें बढ़कर 494 हो गईं, जबकि 1962 में यह संख्या स्थिर रही। 1967 में जनसंख्या और राजनीतिक विविधता को देखते हुए सीटों की संख्या बढ़ाकर 520 कर दी गई।
1971 में सीटें घटकर 518 हो गईं, लेकिन 1977 में यह बढ़कर 542 हो गईं। इसके बाद 1980 में लोकसभा सीटों की संख्या 543 तय की गई, जो आज तक कायम है।
इस पूरे बदलाव में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 1976 में आया, जब सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सीटों की संख्या पर ‘फ्रीज’ लगा दिया। यह फ्रीज पहले 2001 तक लागू था, जिसे बाद में बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया।
इस दौरान परिसीमन की प्रक्रिया तो हुई, लेकिन कुल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है, उनका प्रतिनिधित्व कम न हो।
अब 2026 के बाद इस फ्रीज के खत्म होने की संभावना है, जिससे परिसीमन की प्रक्रिया फिर शुरू हो सकती है। सरकार का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व बढ़ाना आवश्यक है, वहीं महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए भी सीटों का विस्तार जरूरी माना जा रहा है।
हालांकि इस संभावित बदलाव को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों में चिंता भी जताई जा रही है। उनका मानना है कि नई व्यवस्था में उनके प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
यदि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ती है, तो यह भारतीय संसद के इतिहास में छठा बड़ा बदलाव होगा। यह केवल संख्या का मामला नहीं है, बल्कि इससे राज्यों के बीच शक्ति संतुलन, नीति निर्माण और लोकतांत्रिक ढांचे पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। परिसीमन और सीटों में संभावित वृद्धि भारत के लोकतंत्र के विकास की अगली बड़ी कड़ी साबित हो सकती है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।