उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का संदेश: 2047 तक विकसित भारत और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर
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उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक नेतृत्व को महत्वपूर्ण बताया।
आतंकवाद, साइबर खतरों और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए दूरदर्शी नीतियों और प्रभावी रणनीतियों की आवश्यकता बताई।
New Delhi / भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य आखिर कैसे हासिल होगा? राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक चुनौतियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने रणनीतिक नेतृत्व को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। जानिए उनके संबोधन की बड़ी बातें।
नई दिल्ली से राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत के भविष्य से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय यानी एनडीसी के 66वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय मूल्यों, राष्ट्रीय हितों और राष्ट्रीय उद्देश्यों के बीच मजबूत संबंध पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में देश की सुरक्षा और विकास के लिए रणनीतिक सोच, एकीकृत नीति निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इस कार्यक्रम में भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, पुलिस और अन्य सरकारी संगठनों के अधिकारियों के साथ मित्र देशों के अधिकारी भी शामिल हुए। कुल 122 प्रतिभागियों में 41 अधिकारी विदेशी मित्र देशों से थे।
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने भारत के प्राचीन दर्शन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय मूल्य किसी देश की पहचान और वैश्विक संबंधों को दिशा देते हैं। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की वैक्सीन मैत्री पहल, आपदाओं के समय सहायता और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को इन मूल्यों के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के राष्ट्रीय हित उसके संवैधानिक मूल्यों से प्रेरित हैं। इनमें संप्रभुता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता शामिल हैं। उन्होंने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने, रणनीतिक एवं आर्थिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और विकास के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने पर जोर दिया। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में भारत की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।
बदलती सुरक्षा चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने आतंकवाद, साइबर खतरों, महामारियों, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसी समस्याओं से निपटने के लिए देशों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, सूचना साझा करना, आपसी विश्वास कायम करना और समन्वित कार्रवाई करना आज की वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के लिए जरूरी है।
भारत के वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य पर बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने दीर्घकालिक दृष्टिकोण, उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग और मजबूत नीतिगत फैसलों की अहमियत बताई। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा करना नहीं है, बल्कि भूमि, हवाई क्षेत्र, समुद्री हितों और साइबर क्षेत्र को सुरक्षित रखने के साथ सतत विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाना भी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की शक्ति बढ़ाने का उद्देश्य किसी देश पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की रक्षा करना होना चाहिए। उन्होंने वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ सहयोग बढ़ाने और तकनीक, व्यापार, शिक्षा, नवाचार तथा क्षमता निर्माण में साझेदारी मजबूत करने का भी आह्वान किया। भ्रष्टाचार को साझा चुनौती बताते हुए उन्होंने इसके खिलाफ सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
अंत में, उपराष्ट्रपति ने भावी रणनीतिक नेताओं से संस्थागत सीमाओं से आगे बढ़कर दूरदर्शी और एकीकृत सोच अपनाने की अपील की। उन्होंने राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा, स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण और योजनाओं को ठोस परिणामों में बदलने पर जोर दिया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय के कमांडेंट एयर मार्शल मनीष कुमार गुप्ता, संकाय सदस्य और 66वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागी उपस्थित रहे।