मकर संक्रांति 2026: सूर्योपासना और सांस्कृतिक एकता का राष्ट्रीय महापर्व

Wed 14-Jan-2026,03:21 PM IST +05:30

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मकर संक्रांति 2026: सूर्योपासना और सांस्कृतिक एकता का राष्ट्रीय महापर्व मकर संक्रांति: सूर्योपासना और सांस्कृतिक एकता का राष्ट्रीय महापर्व
  • मकर संक्रांति उत्तरायण, सूर्योपासना और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक पर्व है, जो भारतीय सांस्कृतिक एकता और कर्मशील जीवन-दर्शन को सुदृढ़ करता है।

  • देशभर में विभिन्न नामों से मनाया जाने वाला यह पर्व कृषि, प्रकृति और सामाजिक समरसता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।

  • आधुनिक भारत में मकर संक्रांति आशा, ऊर्जा, स्वास्थ्य और राष्ट्रहित में सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देता है।

Delhi / New Delhi :

दिल्ली/ उत्तरायण की पुण्यवेला में मकर संक्रांति का पर्व भारतभर में श्रद्धा, उल्लास और सांस्कृतिक गौरव के साथ मनाया गया। यह दिन केवल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का संकेत नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन में सकारात्मक परिवर्तन, कर्मशीलता और आशा के नवसंचार का प्रतीक माना जाता है। खेतों से नगरों तक, मंदिरों से आकाश में उड़ती पतंगों तक, यह पर्व सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करता दिखाई दिया।

मकर संक्रांति भारतीय पंचांग के उन विशेष पर्वों में से है, जो खगोलीय घटना के साथ-साथ गहन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं, जिसे सनातन परंपरा में शुभता, ऊर्जा और प्रकाश का संकेत माना गया है। मान्यता है कि उत्तरायण काल में किए गए शुभ कर्मों का फल शीघ्र प्राप्त होता है।

देश के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया गया। उत्तर भारत में स्नान-दान और सूर्य पूजा का विशेष महत्व रहा, वहीं महाराष्ट्र में तिल-गुड़ के माध्यम से मधुर संबंधों और सौहार्द का संदेश दिया गया। पंजाब में लोहड़ी के रूप में अग्नि पूजा और लोकगीतों के साथ नई फसल का स्वागत हुआ। गुजरात में उत्तरायण पतंग उत्सव ने आकाश को रंग-बिरंगी पतंगों से भर दिया, जो उत्साह और प्रतिस्पर्धा का जीवंत प्रतीक बना। तमिलनाडु में पोंगल और असम में भोगाली बिहू के रूप में यह पर्व कृषि संस्कृति और श्रम के सम्मान से जुड़ा दिखा।

मकर संक्रांति केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के संबंधों की पुनः पुष्टि भी है। यह पर्व किसानों के परिश्रम, सूर्य की ऊर्जा और ऋतु चक्र के संतुलन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। सामाजिक स्तर पर यह दिन आपसी भेदभाव भूलकर साथ बैठने, बाँटने और शुभकामनाएँ देने की प्रेरणा देता है।

आधुनिक समय में भी मकर संक्रांति का संदेश प्रासंगिक है, अंधकार से प्रकाश, निष्क्रियता से कर्म और निराशा से आशा की ओर बढ़ना। यही कारण है कि यह पर्व सांस्कृतिक विविधता के बावजूद भारत की अंतर्निहित राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है और सामूहिक चेतना में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।