सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: पीएम ने विरासत, पुनर्निर्माण और भारत के संकल्प को बताया शक्ति

Sun 11-Jan-2026,05:15 PM IST +05:30

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सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: पीएम ने विरासत, पुनर्निर्माण और भारत के संकल्प को बताया शक्ति
  • प्रधानमंत्री ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को भारत के आत्मसम्मान, सांस्कृतिक चेतना और हजार वर्षों के संघर्ष का प्रतीक बताया। 

  • सोमनाथ का इतिहास विनाश नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण, प्रतिरोध और सनातन आस्था की विजय की गाथा है। 

  • विरासत से विकास के मंत्र के साथ सोमनाथ क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर और सांस्कृतिक विस्तार को गति दी जा रही है।

Gujarat / Gir Somnath :

सोमनाथ/ गुजरात के प्रभास पाटन स्थित सोमनाथ मंदिर में आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान प्रधानमंत्री ने देशवासियों को संबोधित करते हुए भारत की सनातन आस्था, सांस्कृतिक चेतना और हजार वर्षों के संघर्षपूर्ण इतिहास को स्मरण कराया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने सोमनाथ के विध्वंस और पुनर्निर्माण की गाथा को भारत के आत्मसम्मान, प्रतिरोध और पुनर्जागरण का प्रतीक बताया तथा विकसित भारत के संकल्प को आस्था और विरासत से जोड़कर प्रस्तुत किया।

प्रधानमंत्री ने अपने भावपूर्ण संबोधन की शुरुआत “जय सोमनाथ” के उद्घोष के साथ की और गुजरात सरकार के नेतृत्व, जनप्रतिनिधियों तथा देश-विदेश से जुड़े करोड़ों श्रद्धालुओं का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, परंपरा और आत्मगौरव का जीवंत उत्सव है।

प्रधानमंत्री ने सोमनाथ के दिव्य वातावरण का उल्लेख करते हुए कहा कि समुद्र की लहरें, मंत्रोच्चार, सूर्य किरणें और श्रद्धालुओं की उपस्थिति इस आयोजन को अलौकिक बना रही हैं। 72 घंटे तक चले अनवरत ओंकार नाद, वैदिक मंत्रोच्चार, ड्रोन शो द्वारा हजार वर्षों की गाथा का प्रदर्शन और 108 अश्वों के साथ शौर्य यात्रा को उन्होंने भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा कि ठीक एक हजार वर्ष पहले इसी भूमि पर हमारे पूर्वजों ने अपनी आस्था की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। बार-बार हुए आक्रमणों के बावजूद सोमनाथ की ध्वजा आज भी यह उद्घोष करती है कि भारत की आत्मा अजेय है। प्रधानमंत्री ने उन सभी वीर-वीरांगनाओं को नमन किया जिन्होंने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्निर्माण को जीवन का लक्ष्य बनाया।

प्रधानमंत्री ने सोमनाथ के इतिहास को भारत के इतिहास से जोड़ते हुए कहा कि जैसे सोमनाथ को नष्ट करने के अनेक प्रयास हुए, वैसे ही भारत को मिटाने की भी बार-बार कोशिशें हुईं, लेकिन दोनों ही अडिग रहे। उन्होंने 1026 ईस्वी से लेकर मध्यकालीन आक्रमणों, कुमारपाल द्वारा पुनर्निर्माण, अहिल्याबाई होल्कर के योगदान और 1951 में स्वतंत्र भारत में पुनर्स्थापना तक की ऐतिहासिक यात्रा का क्रमबद्ध उल्लेख किया।

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि सोमनाथ का इतिहास पराजय का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल पत्थरों का नहीं था, बल्कि संस्कृति, चेतना और आत्मसम्मान की रक्षा का था। उन्होंने उन प्रयासों की आलोचना भी की, जिनमें आक्रमणों को केवल लूट तक सीमित बताकर इतिहास को विकृत करने की कोशिश की गई।

प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल, जाम साहब महाराजा दिग्विजय सिंह और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत के आत्मगौरव का आधार बना। उन्होंने आगाह किया कि आज भी भारत विरोधी शक्तियां नए तरीकों से षड्यंत्र रच रही हैं, इसलिए एकता और जागरूकता आवश्यक है।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने ‘विरासत से विकास’ के दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, माधवपुर मेले, गिर लायन संरक्षण, केशोद एयरपोर्ट विस्तार, वंदे भारत ट्रेन और तीर्थ सर्किट विकास जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक भारत आस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सभ्यता का संदेश घृणा नहीं, बल्कि संतुलन, सृजन और सद्भाव है। सोमनाथ की हजार वर्षों की गाथा पूरी मानवता को यह सिखाती है कि सृजन का मार्ग ही स्थायी होता है। उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि वे अपनी विरासत से जुड़े रहकर विकसित भारत के निर्माण के संकल्प को साकार करें।