आईआईटी रुड़की ने विकसित किया ड्रोन सिस्टम, अब ढाई करोड़ में हो सकेगी कृत्रिम बारिश

Sun 01-Feb-2026,11:56 PM IST +05:30

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आईआईटी रुड़की ने विकसित किया ड्रोन सिस्टम, अब ढाई करोड़ में हो सकेगी कृत्रिम बारिश IIT-Roorkee-Develops-Drone-System-to-Enable-Artificial-Rain-at-Low-Cost
  • आईआईटी रुड़की ने विकसित किया DHRO सिस्टम, जिससे महंगी विमान तकनीक के बजाय कम लागत में कृत्रिम बारिश संभव होगी।

  • क्लाउड सीडिंग ड्रोन आधारित प्रक्रिया से बारिश बनाने की क्षमता बढ़ी, लागत घटकर ढाई करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद।

  • सूखे और जल संकटग्रस्त राज्यों में इस तकनीक के उपयोग से कृषि और जल प्रबंधन क्षेत्र को बड़ी राहत मिल सकती है।

Delhi / New Delhi :

रुड़की /  जल संकट और अनियमित वर्षा से जूझ रहे कई राज्यों के लिए राहत की उम्मीद जगाते हुए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति की है। संस्थान ने एक ऐसा ड्रोन-आधारित हाई-केपेसिटी रेन इंड्यूसिंग ऑपरेशन (DHRO) विकसित किया है, जिसकी मदद से बेहद कम लागत में कृत्रिम बारिश (Artificial Rain) कराना संभव हो सकेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जहां पहले कृत्रिम बारिश की प्रक्रिया पर करोड़ों रुपये खर्च होते थे, वहीं अब यह तकनीक सिर्फ ढाई करोड़ रुपये में ही संभव हो सकेगी।

आईआईटी रुड़की की जल संसाधन टीम ने बताया कि यह DHRO सिस्टम क्लाउड सीडिंग के आधुनिक स्वरूप पर आधारित है, जिसमें ड्रोन प्राकृतिक बादलों के भीतर जाकर विशेष रसायन और पार्टिकल्स का उपयोग करता है, जिससे बादलों में संघनन की प्रक्रिया तेज होती है और बारिश बनकर गिरने लगती है। पहले यह काम बड़े, महंगे और हाई-ऑपरेशन कॉस्ट वाले विमानों से किया जाता था, जिससे लागत कई गुना बढ़ जाती थी।

नए विकास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और इसे विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि DHRO को पहाड़ी, मैदानी और शुष्क क्षेत्रों में समान रूप से ऑपरेट किया जा सकता है। यह तकनीक पानी की कमी वाले जिलों, सूखे से प्रभावित इलाकों और खेती निर्भर क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

तकनीकी टीम के अनुसार, ड्रोन ऑपरेशन को दूरस्थ रूप से नियंत्रित किया जा सकता है और इसका संचालन अत्यंत सुरक्षित है। इसके अलावा यह तकनीक मॉनसून पूर्व परीक्षणों में सफल पाई गई है, जिससे उम्मीद है कि आने वाले वर्ष में विभिन्न राज्यों में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा सकेगा।

राज्यों के जल संसाधन विभाग और कृषि मंत्रालय ने भी इस तकनीक में रुचि दिखाई है। यदि यह तकनीक सरकारी स्तर पर अपनाई जाती है, तो भारत कृषि, उद्योग और जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगा सकता है।