भारत-अमेरिका समझौते से रूस के तेल निर्यात पर दबाव
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भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद में कमी से मॉस्को की निर्यात रणनीति और राजस्व पर बढ़ता आर्थिक दबाव।
हिंद महासागर में रूसी टैंकरों द्वारा सिंगापुर जैसे प्लेसहोल्डर डेस्टिनेशन दिखाने की नई रणनीति सामने आई।
Delhi/ वैश्विक ऊर्जा बाजार में इन दिनों महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी तथा व्यापार समझौतों के बाद रूस के कच्चे तेल निर्यात पर दबाव बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग डेटा और बाजार विश्लेषकों के अनुसार, भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद में कमी और चीन की सतर्कता ने मॉस्को की आर्थिक रणनीति को प्रभावित किया है। हिंद महासागर में रूसी टैंकरों की गतिविधियां इस बदलते परिदृश्य की ओर संकेत कर रही हैं।
भारत लंबे समय तक रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदता रहा है, जिससे रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच बड़ा बाजार मिला। हालांकि हालिया रिपोर्टों में संकेत है कि भारत ने अपनी खरीद में संतुलन बनाना शुरू किया है। भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से खरीद रोकने से इनकार किया है, लेकिन आयात के पैटर्न में बदलाव देखा जा रहा है।
इस बीच, रूसी तेल से भरे कई टैंकर हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी वास्तविक मंजिल छिपाते हुए देखे गए हैं। शिपिंग रिकॉर्ड में अंतिम गंतव्य के रूप में सिंगापुर का नाम दर्ज किया जा रहा है, जबकि सिंगापुर प्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल आयात नहीं करता। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘प्लेसहोल्डर डेस्टिनेशन’ रणनीति असली खरीदारों की पहचान छिपाने के लिए अपनाई जा रही है।
ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार, सिंगापुर और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में शिप-टू-शिप ट्रांसफर या फ्लोटिंग स्टोरेज के माध्यम से तेल की अदला-बदली की जाती है। इसके बाद कार्गो को मलेशिया, चीन या अन्य एशियाई बाजारों की ओर भेजा जाता है। यह प्रक्रिया प्रतिबंधों से बचने और ट्रैकिंग को जटिल बनाने का तरीका मानी जा रही है।
चीन, जो रूस का प्रमुख ऊर्जा खरीदार है, वह भी पश्चिमी प्रतिबंधों के जोखिम को देखते हुए सावधानी बरत रहा है। स्पॉट मार्केट में खरीद सीमित रखने से रूस के निर्यात विकल्प और संकुचित हो रहे हैं।
यूक्रेन युद्ध के दौरान तेल और गैस निर्यात रूस की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है। लेकिन हालिया प्रतिबंधों, घटती मांग और लॉजिस्टिक जोखिमों के कारण राजस्व में गिरावट दर्ज की जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ऊर्जा करों से प्राप्त आय में कमी से बजट पर दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो रूस को घरेलू कर्ज और कर संग्रह पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा कंपनियों और संबंधित शिपिंग नेटवर्क पर लगाए गए प्रतिबंधों ने वैश्विक शिपिंग कंपनियों को सतर्क कर दिया है। प्रतिबंधित कार्गो ढोने वाले जहाजों को अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर किए जाने का जोखिम है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ा है।
भारत-अमेरिका सहयोग, चीन की सतर्क नीति और पश्चिमी प्रतिबंधों का संयुक्त प्रभाव रूस के तेल निर्यात पर स्पष्ट दबाव बना रहा है। टैंकरों द्वारा सिंगापुर जैसे कागजी गंतव्य दिखाना इस बदलते भू-राजनीतिक समीकरण का संकेत माना जा रहा है।