किशोरावस्था में यौन शिक्षा की अनदेखी: बढ़ती उलझनों की असली वजह
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किशोरावस्था में यौन शिक्षा की अनदेखी से बढ़ते मानसिक और सामाजिक मुद्दे.
सही जानकारी से सुरक्षा, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी का विकास.
स्कूल और परिवार में खुला संवाद आवश्यक.
AGCNN / किशोरावस्था जीवन का वह दौर है, जब शरीर और मन दोनों में तेज़ी से बदलाव होते हैं। यह उम्र जिज्ञासा, आकर्षण, भ्रम और आत्म-खोज से भरी होती है। ऐसे समय में सही मार्गदर्शन और जानकारी न मिले, तो यही जिज्ञासा कई बार गलत दिशा में चली जाती है। आज का एक बड़ा सामाजिक मुद्दा यह है कि किशोरावस्था में यौन शिक्षा की आवश्यकता को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, जिसके कारण मानसिक तनाव, गलत व्यवहार और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं।
भारत जैसे समाज में यौन शिक्षा को आज भी झिझक और संकोच के साथ देखा जाता है। माता-पिता अक्सर इस विषय पर बात करने से बचते हैं और स्कूलों में भी इसे औपचारिकता तक सीमित रखा जाता है। परिणामस्वरूप किशोर अपनी जिज्ञासाओं के जवाब इंटरनेट, सोशल मीडिया या दोस्तों से तलाशते हैं, जहां सही और गलत जानकारी का फर्क करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। यही गलत जानकारी आगे चलकर सोच, व्यवहार और रिश्तों पर नकारात्मक असर डालती है।
किशोरावस्था में शरीर में हार्मोनल बदलाव आते हैं, जिनके कारण भावनात्मक उतार-चढ़ाव सामान्य होते हैं। लड़कियों में मासिक धर्म की शुरुआत, लड़कों में शारीरिक परिवर्तन और दोनों में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब इन बदलावों को लेकर सही जानकारी नहीं मिलती, तो डर, शर्म और अपराधबोध की भावना पैदा हो जाती है। कई किशोर खुद को असामान्य समझने लगते हैं, जिससे आत्मविश्वास कमजोर होता है।
यौन शिक्षा का एक अहम पहलू यह भी है कि यह किशोरों को अपने शरीर की सीमाओं और व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में जागरूक बनाती है। आज के समय में बच्चों और किशोरों के साथ होने वाले शोषण के मामलों में बढ़ोतरी एक गंभीर चिंता का विषय है। यदि बच्चों को यह सिखाया जाए कि कौन-सा व्यवहार गलत है और किसी भी असहज स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए, तो वे खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। चुप्पी और अज्ञान ही शोषण को बढ़ावा देते हैं।
इसके अलावा, यौन शिक्षा रिश्तों में सम्मान और सहमति की समझ विकसित करती है। यह बताती है कि किसी भी प्रकार का शारीरिक या भावनात्मक संबंध तभी सही है, जब दोनों पक्षों की स्पष्ट सहमति हो। किशोरों में यह समझ विकसित होना बेहद जरूरी है, ताकि वे दूसरों की भावनाओं और सीमाओं का सम्मान करना सीखें। इससे भविष्य में हिंसा और जबरदस्ती से जुड़े मामलों में कमी लाई जा सकती है।
किशोरावस्था में यौन शिक्षा का अभाव मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। गलत धारणाओं और अधूरी जानकारी के कारण कई युवा तनाव, चिंता और अपराधबोध से जूझते रहते हैं। वे अपने सवाल किसी से पूछ नहीं पाते और भीतर ही भीतर घुटन महसूस करते हैं। कई मामलों में यही मानसिक दबाव गलत फैसलों, जोखिम भरे व्यवहार और अवसाद का कारण बन जाता है। समाज में यह भ्रांति भी फैली हुई है कि यौन शिक्षा देने से बच्चे जल्दी गलत रास्ते पर चले जाते हैं। जबकि शोध और अनुभव बताते हैं कि सही और उम्र के अनुसार दी गई जानकारी बच्चों को अधिक जिम्मेदार बनाती है। वे अपने फैसले सोच-समझकर लेते हैं और जोखिम से बचते हैं। जानकारी की कमी ही असल खतरा है, न कि जानकारी की उपलब्धता।
इस मुद्दे पर स्कूलों की भूमिका बेहद अहम है। यौन शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना ही काफी नहीं, बल्कि इसे संवेदनशील और संवादात्मक तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए। शिक्षकों को भी प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है, ताकि वे बिना झिझक और पूर्वाग्रह के बच्चों के सवालों के जवाब दे सकें। साथ ही, माता-पिता को भी अपनी सोच बदलनी होगी और बच्चों के साथ खुला संवाद स्थापित करना होगा।
आज के डिजिटल युग में जहां हर तरह की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, वहां किशोरों को सही और वैज्ञानिक जानकारी देना और भी जरूरी हो गया है। यदि समाज इस मुद्दे पर आंखें बंद किए रहा, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक और सामाजिक रूप से और अधिक उलझन में फंस सकती है किशोरावस्था में यौन शिक्षा कोई विवादास्पद विषय नहीं, बल्कि समय की जरूरत है। इसे नैतिकता, सम्मान और जिम्मेदारी के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। सही समय पर दी गई सही जानकारी न केवल किशोरों को सुरक्षित बनाती है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी, संवेदनशील और संतुलित व्यक्ति बनने में भी मदद करती है। यही किसी भी स्वस्थ समाज की बुनियाद होती है।